बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

गुरिल्ला सिनेमा अब एक टर्म (पद) के रूप में स्वीकृत हो चुका है.


गुरिल्ला सिनेमा अब एक टर्म (पद) के रूप में स्वीकृत हो चुका है. इसका प्रमाण है हिन्दुस्तान टाइम्स की ये रिपोर्ट.पहली गुरिल्ला फिल्म ( द मीट) भी कलकत्ता में ही शूट हुई और दूसरी फिल्म अनुराग बासु भी वही शूट कर रहे हैं. ओझा जी को क्रेडिट दिए बिना ये बढे जा रहे हैं. बढिए और बने रहिये अनुराग जी, रणबीर जी. गुरिल्ला टीम की शुभकामनाएं.
जय हो दादस साहेब फालके की ! ---

Ranbir Kapoor takes ‘guerrilla’ route
Prashant Singh, Hindustan Times
Mumbai, January 30, 2012
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First Published: 11:33 IST(30/1/2012)
Last Updated: 12:09 IST(30/1/2012)
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Ranbir Kapoor's fans gathered in large numbers as the news of his shooting at Darjeeling railway station spread like wild fire. Here's a glimpse at the Barfee star.
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Ranbir Kapoor is the newest entrant to Salman and Aamir Khan’s special clique — the guerrilla shooting stars. Even before the Kapoor scion reached Kolkata, to start shooting for Anurag Basu’s Barfi!, the director had decided to employ this independent filmmaking style.

“Anurag didn’t


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want to invite unwanted attention. Plus, clearing crowded bylanes and roads in Kolkata wouldn’t have been an easy job. So, by employing the guerrilla filmmaking style, he served the dual purpose,” says an unit hand from Barfi!.

As a result, Ranbir found himself in the midst of the chaos that surrounded locations such as Phool Market, Mullick Ghat, Old Tram Station, Dorjipada near Hathi Bagan (all in north Kolkata) and Laha Badi in Central Avenue (in central Kolkata).

Basu admits it was exciting to shoot the crowded spots, which included a few famous streets of Kolkata. “We deliberately went about doing it and came up with some great shots,” says the director.

“Ranbir too was excited to shoot a film in this novel style. All the crew members were briefed in advance about how to go about capturing the shot, while the actors were put in real locations,” says the unit hand.

Basu adds that people were “completely oblivious” to the fact that they were shooting a film. “And it has given us some great, natural reactions to capture, especially during the chase sequence. Suddenly, the locals were faced by the star Ranbir Kapoor running through their busy lanes and streets,” adds the director.

Barfi!, produced by UTV Motion Pictures, will release on July 13. Besides Ranbir, the film also stars Priyanka Chopra and Ileana D’Cruz.
 ·  ·  · about a minute ago

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

कला के तीन क्षण और काशी का अस्सी


निर्देशक कि डायरी २३
कला के तीन क्षण और काशी का अस्सी 

                                                                           अनुपम 
                                                                                         
                                                          
दो सप्ताह पहले इस कथा -रचना को पढ़ गया. इसपर फिल्म भी आ रही है - मोहल्ला अस्सी. फ़िलहाल फिल्म पर नहीं इस उपन्यास पर मै अपनी प्रतिक्रिया देना चाहता हूँ. इस कथा रचना को पढ़कर मजा आया. शिल्प के स्तर पर मै  इसको एक जटिल कृति मानता हूँ. निरर्थक चरित्रों और घटनाओं से एक कथा रचना की बुनावट काफी चैलेंजिंग काम है.कथा तत्त्व के धरातल पर बनारस के बाहर वालों के लिए यह एक झरोखा है. जिस से वे बनारस की एक चाय की दुकान में कुछ चुने गए चरित्रों और अस्सी मोहल्ला के कुछ चित्रों को देख सकते हैं. हालाँकि यहाँ चरित्रों की जगह मित्रों शब्द का भी प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि बहुत से अर्थवान चरित्रों को सफाई से काशीनाथ सिंह ने क़तर दिया है. यहाँ उनके नाम गिनाकर उनके नाम को मै हल्का नहीं करना चाहूँगा लेकिन वे पत्रकार, शिक्षक, कवि, लेखक, सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं और उनके 'कारनामे' जग जाहिर हैं. 

पूरी किताब पढने के बाद मैंने इसे उलट पलट के देखा की वह 'असी' नदी कहाँ है जिसके किनारे बसे इस मोहल्ले का वर्णन किया गया है. दुर्भाग्य से वह बिलकुल नदारद है. हालाकी असी का नदी के रूप में भी अस्तित्व अब नहीं रह गया है. वरुणा और असी नदी के बीच बसे नगर को वाराणसी संज्ञा मिली थी.  दोनों ही नदियाँ अब बदबूदार परनालों में बदल गई हैं. चरित्रों की क़तर ब्योत में असी नदी को भी छाँट देना मेरी समझ के बाहर है. मै यह तो नहीं मान सकता की डॉ. काशीनाथ सिंह के ध्यान में यह बात नहीं आई होगी. इसका जवाब तो उन्ही से मिलने की उम्मीद की जानी चाहिए.
यह 'काशी का अस्सी', काशीनाथ सिंह का अस्सी है, जो उनके गिने चुने मित्रो और लगुओं भगुओं से बनता है . यह काशी या बनारस का 'असी' मोहल्ला नहीं है. वह अब भी एक आंचलिक विषय के रूप में अछूता रह गया है.
यह कथा-रिपोर्ताज है, संस्मरण है, उपन्यास है या कहानी संग्रह, इस विषय पर काफी बहसें हुई हैं, जैसा की इसके फ्लैप पर लिखा है - 'उपन्यास के परम्परित मान्य  ढांचो के आगे एक प्रश्न चिह्न' . अगर उपन्यास की ही शैली में कहूँ तो यह 'चैतन्य चूतियापा' है.
सारिका के किसी पुराने अंक में मैंने कभी पढ़ा था ; तमिल भाषा के एक मूर्धन्य लेखक अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बता रहे थे कि उपन्यास के फर्स्ट ड्राफ्ट में वे चरित्रों का वास्तविक नाम लिखा करते थे. इससे उनको चरित्रांकन करने में सुविधा होती थी. दूसरे ड्राफ्ट में वे चरित्र के अनुकूल नामकरण कर देते थे और तीसरे ड्राफ्ट में चरित्रों को गढ़ देते थे जिसका मूल चरित्र से कुछ खास लेना देना नहीं रह जाता था. इस नजर से देखा जाए तो काशी का अस्सी फर्स्ट ड्राफ्ट है. यह अधपका बेर है जिसका स्वाद खट्टा मीठा है.
मुक्तिबोध की थियरी कला के तीन क्षण पर इस कृति को कसा जाए तो यह पहला और अनुभव का क्षण है. इस हिसाब से इस कथा कृति ने अपना दूसरा और तीसरा क्षण जिया ही नहीं. यह गर्भस्थ शिशु का प्रदर्शन है.
यह काफी पॉपुलर हुआ है.हालाँकि यह अगर किसी पॉकेट बुक्स से छपता तो और प्रसिद्द होता और साहित्य के व्यवसायीकरण का एक रास्त खुलता.  इसकी प्रसिद्धि के पीछे इसके चरित्रों की सादगी और स्थितिजन्य हास्य है. जिन व्यक्तियों और व्यक्तित्वों के सहज व्यवहार को इस कथा में सीधे कॉपी पेस्ट किया गया है, उनकी जीवंत उपस्थिति इस कथानुमा कृति को ग्राह्य बनाती है. मुझे नहीं लगता है कि अपने चरित्र के विचित्र चित्रांकन से वे जीवित मनुष्य अहसानमंद हुए होंगे ? कमाल की भाषा और धारदार शिल्प से लैस कथाकार काशीनाथ सिंह की ये कृति थके हुए शिकारी के शिकार की तरह है जिसने छर्रा फायर कर के ढेर सारे पक्षी मार गिराए हों, हालाँकि इरादा शेर मारने का था. 
फिल्म के लिए ये बहुत ही अच्छा कच्चा माल है. उम्मीद है इस कला का दूसरा और तीसरा क्षण फिल्म रूप में आ गया हो.  
   

अपने आप को दोहराना विकास नहीं है.

कवि निर्देशक की डायरी २२ 
                                                                                                                            अनुपम
अग्निपथ का रीमेक देखने की मेरी कोई इच्छा नहीं है. गाँव कस्बो में भी हिट फिल्मो का मंचन होता है. मै वह भी देखने नहीं जाता. सितारों पर केन्द्रित अग्निपथ और डॉन जैसी फिल्मो को फिर से बनाना बेवकूफी है. कहानी को आगे बढ़ाते तो बात अलग थी, ये तो अमिताभ बच्चन का रोल कर रहे हैं या और अदाकारों की कॉपी करने की कोशिश करते हैं. साफ़ है कि बम्बई फिल्म इंडस्ट्री में विचारों का अभाव हो गया है. सिनेमा व्यवसाय का गुणा गणित बदल गया है. ये नए सितारे अपने बल पर कुछ करने में सक्षम नहीं दिख रहे है. इन्हें अपने आप को दोहराना पड़ रहा है. यह हिंदी सिनेमा का मूर्ख काल है. परिवर्तन का समय है. एक योग्य निर्देशक ही अच्छी स्क्रिप्ट लिख या चुन सकता है. सचाई ये है कि बम्बई फिल्म इंडस्ट्री में निर्देशक तो गिने चुने ही रह गए हैं, ठेकेदार काफी बड़ी संख्या में काम कर रहे हैं. बढ़िया मनोरंजन पैदा करना जिनके वश में नहीं है. ये सिर्फ धंधा कर सकते हैं और कर रहे हैं. मनोरंजन कि भूखी जनता को ठग रहे हैं . जनता के बीच से ही इनका जवाब निकल कर आएगा और समय आ चुका है.    
मै निकट भविष्य की घोषणा कर रहा हूँ कि आगे आ रही तेज आंधी में ये सितारे कागज के पोस्टरों की तरह उड़ जाने वाले हैं, जिसका इनको पता है; ये इतने भी बेवकूफ नहीं है, इसलिए जैसे तैसे दाम बनाने में लगे हैं. प्रतिभाहीन लोगों में प्रयोग का साहस नहीं होता, दोहराव की चालकी होती है और यह व्यक्ति करे या एक इंडस्ट्री, ज्यादा दिन नहीं चलती. अपने आप को दोहराना विकास नहीं है.

 तकनिकी सरलता और नयी प्रतिभाओं की गर्मी से हिंदी का ये (जड़ सिनेमा-समय) मोम की तरह पिघल जाएगा क्योंकि एक समानांतर फिल्म उद्योग खड़ा हो रहा है जिसमे कवि, वैज्ञानिक, कलाकार, समाजसेवी और सुबुद्ध लोग  सक्रिय  हो रहे हैं.

पुनः -
दादा साहेब फाल्के ने कहा था कि 'पढ़े लिखे लोग फिल्म इंडस्ट्री में आयें.' इसका मतलब डिग्रीधारी नहीं था.
आजकल प्राइवेट फिल्म टीवी संस्थानों से ढेर सारे पैसो के एवज में खूब डिग्रियां बांटी जा रही हैं. फिल्म इंडस्ट्री में डिग्रीधारी मूर्खों की बाढ़ आ गई है जो सिनेमा में घुसना चाहते है लेकिन बेसिक सवाल कि सिनेमा क्या है नहीं जानते, जो सह निर्देशन या निर्देशन करना चाहते है लेकिन निर्देशन क्या है इसका जवाब नहीं है उनके पास, जो एक्टर बनना चाहते हैं लेकिन ठीक से अभिनय शब्द नहीं लिख सकते या नहीं जानते की अभिनय क्या है, वे सभी युवा भले ही किसी भी महान प्राइवेट या सरकारी फिल्म स्कूल से डिग्री लेकर निकले हों, कृपया! कृपया! कृपया !  मुझसे संपर्क न किया करें, क्योंकि मै मूर्ख भक्षक हूँ.  मूर्खों को खा तो जाता हूँ लेकिन थोड़ी बदहजमी हो जाती है. मुह का जायका ख़राब हो जाता है. इतने बेसिर पैर के मूर्ख मुझे पसंद नहीं.

विनय के साथ -
अनुपम 

सोमवार, 30 जनवरी 2012

 नादान
                                                                                                     अनुपम
गधे को
 अगर घोड़ा कहोगे
 तो
 तुम्हे वह 
 गधा समझ लेगा.
इसमें 
तुम्हारी 
नादानी है.

रविवार, 29 जनवरी 2012

अपने हिमालय पर

 अपने हिमालय पर
                                                              अनुपम 
बातें बहुत ज्यादा हैं
मौन सही है.

हवा के एक झोंके से
बहुत पास आ गया था
अब 
अपने पास आ गया हूँ.

मेरे प्यार की इंटेंसिटी इतनी ज्यादा थी
कि 
एक ठंढे तार ने फ्यूज उदा दिए और 
अफ़सोस ये है कि 
मैंने प्यार कर सकने वाला दिल गवां दिया.

तुमने 
जितने हलके में मुझे लिया 
मै उतना हल्का नहीं था
मै भारी था
छूट गया
जमीन पर गिर गया 
मिटटी में मिल गया .

अब तुम दौड़ रही हो 
जब कि मै चला आया हूँ 
अपने हिमालय पर .  

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

बसंत में नखरे


बसंत में नखरे 

  १.                                                                  अनुपम 

तुमने नखरा दिखाया 
मेरा जी उचट गया
तुमसे तो नहीं 
जिंदगानी से 
जो तुम हो मेरे लिए ;
तुम लगी जिंदगी सी 
तुमसे मिला तो जैसे जिंदगी मिली,

तो 
तुमने जो नखरा दिखाया 
मैने नहीं देखा. 

 २.

यह सप्रयास है 
भाषा है
झूठ है
प्यार इसी क्षण है 
तुम हो
मै हूँ
खुशियाँ है 
तो 
व्रण भी हैं .
विश्राम है तो रण भी है,
अदाएं हैं तो पिचकारियों में रंग हैं.
तुम नखरे दिखाओ
मै बसंत बनूँगा . 

बुधवार, 25 जनवरी 2012

Dr. Anupam’s School of Cinema @ art



Dr. Anupam’s School of Cinema @ art
फ्रॉम स्क्रिप्ट तो स्क्रीन
सिनेमा फॉर गुडनेस. ..

अठाईस जनवरी, सरस्वती पूजा के दिन फिल्म शिक्षण का पहला बैच शुरू कर रहा हूँ. मैंने जुलाई २०११ में इसकी तैयारी शुरू की थी.तब फेसबुक पर भी कुछ मित्रों ने स्क्रिप्ट तो स्क्रीन अभियान में भाग लेने की बात कही थी. वे आना चाहें तो उनका स्वागत है.
 इस कोर्स की कोई फीस नहीं है.
 विद्यार्थी सिक्षा और विद्या के प्रतिदान में श्रमदान करेंगे.
 ज्वाइन करने के लिए संपर्क करें. सिर्फ ११ निर्देशकों के साथ मै यह कोर्स शुरू करूँगा. तीन महीने बाद सबके हाथ में उनकी अपनी स्क्रिप्ट होगी. मैंने जबसे ११ लोगों का आह्वान किया था तबसे अबतक सिर्फ ४ लोगों का चयन हो सका. जिन्हें लगता है की उनमे इस अभियान में शामिल होने की प्रबल प्रेरणा है, वे सीधे २८ और २९  जनवरी को दिए गए पते पर किसी भी समय आ सकते हैं. सिनेमा फॉर गुडनेस.

Dr. Anupam’s School of Cinema @ art
Three months weekend course on film making- From script to screen starts on 28 jan.
COURSE – film philosophy, film direction, film history, structure of script and creative writing.
It will be a three months course, two days classes in a week and all total 72 hours package.
Syllabus – brief history of art, history of cinema, structure of cinema. production of cinema, scripting, casting, shooting and editing, idea to answer print.

A brief Introduction of Teacher
Dr.Anupam Ojha
A Well Known film thinker and Film maker, with one Publish book
On Indian Film Theory (Bhartiya cine – Siddhant). Master in literature & Ph.D. in ‘Story and Screenplay of Art movies’ from Banaras Hindu University.
Certificate Course (F.A) from Film and television Institute, Pune.
Written & Directed: Mothers a short story telecasted on NDTV Profit, shown in Indo American film festival.

Dr.Anupam Ojha
Mo.0-9829847365
dranupamojha@gmail.com
http://pratibimb-sarjana.blogspot.co/

Address :
Urja
Building No. – 8, flat No.- 603,
Gaurav galaxy, Phase – One,
Mira Road, East – 401 106