कहानी
समुद्र पुत्र प्राकट्य उर्फ
असत्यनारायण भगवान की कथा
अनुपम ओझा
मां ने मुझे समुद्र के किनारे पाया था।
मेरे पिता मेरे जन्म के कारण नहीं हैं। मुझे तो उनका नाम भी याद नहीं।
मेरी मां समुद्र तट पर सीपियां चुनने जाती थी। उनकी बाज़ार में एक अच्छी क़ीमत मिल जाती थी। किसी किसी सीपी में मोती निकल आता था तो आय थोड़ी बड़ी हो जाती थी। किसी तरह घर गृहस्थी चल जाती थी। मां एक बहुत बड़े मोती को पाने का खयाल पाले हुए थी। उसके खयाल को समुद्र ने सुन लिया था।
एक दिन जब वह सीपियां खोज रही थी कि ऊंची लहरों के साथ एक बहुत बड़ा सीप तट से आ लगा। पहले तो उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। जब हुआ तो वह चहक उठी।
इसमें तो बहुत सारी मोती होंगी। शायद किलो भर या एक ही बहुत बड़ा मोती। ऐसा दहकता हुआ भगवा रंग उसने कभी किसी सीपी का नहीं देखा था। आकार तो विस्मयकारी था ही। उसे घसीटकर मां बाहर ले आई। लकड़ी, चाकू, नुकीले पत्थरों से उसने सीपी का मुंह खोलने की कोशिश की लेकिन वह नहीं खुला।
’इतनी बड़ी सीपी को मैं यहां छोड़ कर जा नहीं सकती हूँ। इतना वजह अकेले उठाकर ले जाना भी सम्भव नहीं है।’
मां हाथ जोड़कर और आँखें मूंदकर खड़ी हो गई।
जय हिंद की ध्वनि के साथ सीपी दो भाग में खुल गई। हाफ पैंट, हाफ शर्ट, काली कड़ी टोपी, कच्ची भूरी दाढ़ी, दाहिने हाथ में भगवा झंडा और बाएं हाथ से मगरमच्छ को पूंछ की तरफ से पकड़े हुए मैं प्रगट हो गया।
बालक की ऐसी छवि देखकर मां मगन और चिंताकुल हो गई।
मैंने सीपी के बाहर कदम बढ़ाते हुए मां से हंसकर कहा –
मां! कहां तू मोती खोजने आई थी और तुझे मैं मिल गया।
मां ने कहा– तुम मोती से कम नहीं हो। तुम त से अनेक वर्णमाला आगे हो। मैं मोती खोजने आई थी, मुझे समुंदर मिल गया। इस तरह मां ने मेरा नाम समुंदर रख दिया। जिसपर बहुत बाद में किसी ने गजल कही –
खुद तो डूबे समंदर ले डूबे
भूत ओ भविष्य अंदर ले डूबे।
राम का राज ले आने वाले
राम का काज बंदर ले डूबे।
डूबना तय था लेकिन बबुआ
सब कहेंगे कलंदर ले डूबे।
लेकिन यह बहुत बाद की बात है।
मेरे प्राकट्य पर प्रसन्न होकर मां ने कहा: जय श्री गणेश!
जय श्री गणेश नहीं मां, जय जय श्री राम! मैंने सुधारा।
मां ने तुरत मान लिया।
मुझे यह बात बहुत अच्छी लगी।
मां ने कहा – बेटा, तुझे पाकर मैं निहाल हो गई हूँ। लेकिन इस अवस्था में मैं तुझे घर नहीं ले जा सकती हूँ। सबसे पहले तू इस मगरमच्छ के बच्चे को छोड़ दे।
मैंने तत्काल आज्ञा का पालन किया।
अब इस झंडे को जमीन में गाड़ दे।
पास के ही मंदिर के शीर्ष पर कलश के त्रिशूल में मैंने झंडे को जमा दिया।
अब इस डंडे का क्या करूं मां। मैंने पूछा।
इसे तू अपने साथ रख। शाखा में काम आएगा। बस तू अपनी दाढ़ी हटा दे। छोटे बच्चों में यह ठीक नहीं दिखती है। तेरा स्कूल में प्रवेश नहीं हो पाएगा।
दाढ़ी मुझे पूर्वजन्म से ही प्रिय थी लेकिन मां का कहा मैंने मान लिया और दाढ़ी को छू मंतर कर दिया।
घर चलकर ये कपड़ा और टोपी भी उतार देना। मां ने स्नेह से कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
मैं उछलकर दूर खड़ा हो गया।
यह नहीं हो सकता है मां। मैं गणवेश कभी नहीं उतारूंगा। मैंने कड़े स्वर में कहा।
अरे बेटा! अभी तुम्हें स्कूल ड्रेस पहनना है। इसे पढ़ने लिखने के बाद पहनना।
उसी पल मुझे पढ़ाई से नफरत हो गई।
घर आने के रास्ते में एक चाय की टपरी मिली जहां मुझे मां ने चाय पिलाई और आँचल के खूंट से पैसे खोलकर दिए। दुकान के चूल्हे पर बैठे आदमी को दिखाकर बताया कि यही तेरे पिता हैं। मुझे पिता शब्द से भी नफरत हो गई। जो पिता एक कप चाय भी अपने पुत्र को मुफ्त नहीं पिला सकता है, वह किस बात का पिता! इतना ही काफी नहीं था। उसने दुकान के भीतर राष्ट्रपिता की फोटो लगा रखी थी। फोटो के नीचे उसका पैसे रखने का बक्सा था। उसमें पैसे डालते हुए उसने मां से पूछा– कहां से इस नमूने को उठा लाई। उसके दंतहीन मुखपर व्यंग्य की हंसी देखकर मुझे बहुत गुस्सा आया।
मैंने मन ही मन संकल्प लिया कि एक दिन जरूर इस बुड्ढे का चश्मा तस्वीर में से नोच निकालूंगा।
मां ने मुझे आँचल में समेट लिया और घर की ओर ले चली। जाते जाते मैंने पलटकर अपने पिता की ओर देखा और मुट्ठी बांधकर जोर से नारा लगाया – पाकिस्तान मुर्दाबाद!
मां और पिता दोनों हैरान रह गए क्योंकि तबतक भारत का बंटवारा हुआ ही नहीं था।
मां ने वर्षों से एक पुत्र की इच्छा मन में पाल रखी थी। उसने रंग बिरंगे कपड़े इकट्ठे कर रखे थे। जिनको देख कर मेरा क्रोध पिघल गया। तभी से मुझे रंगीन कपड़ों की आदत हो गई। अगर मुझे चार घंटे बिठाए रखना है तो हर घंटे के हिसाब से कपड़े चाहिए।
स्कूल में मैं तीन से चार ड्रेस लेकर जाता था। चौथी कक्षा में खिड़की के बाहर टेली प्रॉन्पटर लगाकर इम्तहान देते हुए मैं पकड़ा गया। हालाकि तबतक ये आविष्कार हुआ ही नहीं था। शिक्षक इस बात को साबित नहीं कर पाए कि मैं चीट कर रहा था। फिर भी मैंने स्कूल छोड़ दिया।
मैं शहर के अलग अलग मोहल्लों में घूमने निकल जाता था। मां के पूछने पर मैं कह देता कि सम्पर्क बढ़ा रहा हूँ। चाय की टपरी के लिए ग्राहक पटा रहा हूँ। मां मेरी हर बात मान लेती थी।
यही बात एकदिन पिता के सामने दोहरा दी। तो पिता ने कहा कि ऐसी बात है तो तू चाय की केतली लेकर निकला कर। कुछ कमाकर ला।
बात मुझे चुभ गई। मैंने राष्ट्रपिता की तस्वीर से चश्मा नोचकर पहन लिया। चाय की केतली और कप उठाकर चल दिया। शाम को जब खाली केतली और पैसे लेकर लौटा तो पिता चकित रह गए।
कहां बेचकर आ गए बेटा! पिता ने पहली बार मीठा बोला था। मुझे खुश होना चाहिए था लेकिन मैं गंभीर हो गया।
जब किसी भी मुहल्ले से यह खबर नहीं आई कि अज प्रजापति का बेटा यहां चाय बेचकर गया है तो पितासुलभ उत्सुकता से व्याकुल मेरे पिता ने मेरी जेबें टटोली। जेब से नगदी और सिक्कों के साथ एक रेलवे टिकट भी निकल आया।
यह क्या है? पिता ने पूछा।
प्लेटफॉर्म टिकट। मैंने सत्य कहा। जो कि बहुत कम ही बोलना पसन्द है।
पिता ने चश्मा पहनकर टिकट का मुआयना किया। टिकट पर अजगरगंज प्लेटफॉर्म का मुहर दगा हुआ था।
अजगरगंज में रेलवे स्टेशन कब बन गया? पिता ने आश्चर्य से पूछा।
यही चाय की टपरी पर बैठे रहोगे तो दुनिया में क्या हो रहा है, कैसे पता चलेगा? मैंने टिकट झपट लिया और घर चला गया।
अजगरगंज में रेलवे स्टेशन था ही नहीं। पच्चीस साल बाद बनने वाला था। मैं भविष्य में जाकर बकायदे प्लेटफॉर्म टिकट खरीदकर, चाय बेचकर लौट आता था। यह सबकुछ उस चश्मे का कमाल था जिसे गांधी की तस्वीर से नोचकर पहना था, ऐसा पिता सोचते थे।
उस दिन के बाद से वे मुझे भयभीत और विस्मित आंखों से देखने लगे। वे पक्षाघात के शिकार हुए और मरने के दिन तक मुझे कातर निगाहों से नवाजते रहे। मुझे देखते ही हाथ जोड़ लेते थे।
एक दिन उन्होंने कहा – एक दिन सारी दुनिया तुम्हे हाथ जोड़ेगी। तू चाय क्या पूरा देश बेच डालेगा।
इस बात को मैंने हृदयंगम कर लिया।
देवराहा बाबा सरयू नदी से प्रगट हुए थे। भीष्म पितामह गंगा के पुत्र थे। मैं समुद्र मंथन से निकला था। मुझे बेकार समझकर देवताओं ने राक्षसों की तरफ उछाला था। राक्षसों ने मुझे वापस समुद्र में फेक दिया था। समुद्र मंथन में कई बार मैं बाहर निकला लेकिन हर बार मुझे वापस गहराइयों में उछाल दिया गया। देवता और दानव उस समय ही मेरे निशाने पर आ गए थे। कभी तो बाहर निकलूंगा और हिसाब पूरा करूंगा। हजारों साल तक मैं लहरों के चक्रव्यूह में घूमता रहा। कई बार बड़ी लहरों ने मुझे चट्टानों पर पटका लेकिन मेरा कठोर कवच नहीं टूटा।
मुझे ही पता है कि नॉन बायोलॉजिकली पैदा होने के लिए मुझे क्या क्या सहना पड़ा। सतयुग, त्रेता, द्वापर के बाद कलियुग में जब गाद गंदगी भरने से समुद्र का स्तर छिछला हो गया तो अक्सर मैं मल्लाहों के जाल में फंस जाता था। वे भी मुझे उठाकर वापस फेक देते थे। यह तो वैष्णवी मां थी जिसने मेरा उद्धार किया। मैंने संकल्प ले लिया कि वैश्य समाज को इस पृथ्वी पर स्थापित करूंगा और उतनी ही तेजी से देवताओं और दानवों को विस्थापित करूंगा।
मां की मृत्यु तक मैं इस बात को छुपाए रखा कि मैं समुद्र जात हूँ। इसे सिर्फ देवता जानते थे। मैंने उत्तर भारत के तीन तीर्थ स्थानों को चुना अयोध्या, मथुरा और काशी। राम, कृष्ण और शिव। शिव तो पहले से ही अकेले थे तो इनका विस्थापन आसान था, इन्हें दूसरे क्रम पर रखा और कृष्ण को तीसरे स्थान पर क्योंकि ये पॉलिटिकल हैं, इनसे पूरी फुर्सत में भिड़ा जाएगा। राम को सीता से अलग करना जरूरी था। सीता के रहते राम को झंडे पर नचाया नहीं जा सकता था।
जैसा कि वैश्य परिवारों में आम बात है तो हमारे परिवार में भी कई पीढ़ियों से लड्डू गोपाल की पूजा हो रही थी। लड्डू गोपाल के नाश्ता कर लेने के बाद ही हमलोग नाश्ता करते थे। मेरे पिताजी लड्डू गोपाल से बहुत चिढ़ते थे। जब दोपहर के भोजन में लड्डू गोपाल के चलते देरी होती थी तो वे मां को कुछ न कुछ बोलने लगते थे। मां की व्यस्तता में उन्हें ही लड्डू गोपाल को नहलाना धुलाना और भोजन आदि करवाना पड़ता था।
रोज की झिकझिक से तंग आकर मैंने मां से कहा कि लड्डू गोपाल को घर से निकाल दो और श्रीराम की पूजा करो। मां मेरी बात मान गई और धनुष कमान के साथ रामजी घर के पूजा गृह में आ गए। लड्डू गोपाल को पिताजी चाय की दुकान में उठा ले गए। दूध दही और मलाई मक्खन के लालच में लड्डू गोपाल भी खुशी खुशी उनके साथ चले गए। दुकान पर जाने के बाद पिताजी ने लड्डू गोपाल को बिगाड़ना शुरू किया।
"क्या महाराज बीस साल से आप लड्डू गोपाल बने हुए हैं। इतने दिन में इंसान का बच्चा गबरू जवान हो जाता है और आप अभी तक डाइपर बदलवा रहे हैं? माना कि भगवान प्रेम के भूखे होते हैं और उन्हें जिस रूप में पूजो, उसी रूप में बने रहते हैं। लेकिन आप तो लीलाधर हैं। ये क्या कि जनमतुआ बालक बने हुए हो।" रोज तीनों टाइम ऐसी बातें सुन सुन के लड्डू गोपाल के चरित्र में एक वायरस आ गया। एक दिन मेरी मौसी दुकान पर पिताजी से मिलने आई थी। लड्डू गोपाल मौसी के साथ चले गए। कुछ ही दिनों में वैश्य समाज में एक भीषण वायरस फैला था जिसे प्रचारित नहीं होने दिया गया लेकिन दबे स्वर में आज भी उसकी बात होती है। वायरस का दबी जुबान नाम कृष्णा वायरस है। अचानक स्त्रियां गर्भवती होने लगीं और गर्भ प्रदाता का पता नहीं चल पा रहा था। पहले घरेलू नौकरों पर शक किया गया। शक बेबुनियाद नहीं था लेकिन वे कंडोम का इस्तेमाल करने लगे थे। दरअसल सभी लड्डू गोपाल अपनी प्राण प्रतिष्ठा से अबतक की उम्र में आ गए थे। सभी लड्डू गोपाल युवा और प्रौढ़ हो गए थे और जमकर पुत्र दान कर रहे थे।
राज खुलने के बाद यह नियम बना दिया गया कि प्राण प्रतिष्ठा के पांच साल बाद लड्डू गोपाल का विस्थापन या विसर्जन कर दिया जाए।
कृष्णा वायरस फैलता ही गया और लड्डू गोपाल के साथ पूरे देश के हर जाति, हर समुदाय में फैल गया। देश की आजादी के समय तीस करोड़ आबादी थी और सिर्फ सत्तर साल बाद एक सौ तीस करोड़ हो गई।
कृष्णा वायरस पूरी दुनिया में फैल गया और दुनिया की आबादी इतनी ज्यादा हो गई कि धरती बोझ से चरमराने लगी।
सौ साल बाद इसी के जवाब में कोरोना वायरस लाया गया। बिजलियां गिराई गईं। बारिशे करवाई गईं। पहाड़ों को उड़ाया गया। लेकिन यह सब बहुत बाद में हुआ। यह जब हुआ तब पूरी दुनिया में नॉन बायोलॉजिकल प्रधान ही टॉप पर थे। कोई बारूद की खदान से निकला था, कोई मंगल पर गए यान में चिपटकर आ गया था और यहां फूल फैल कर शासन कर रहा था। बारूद और खून हमारा प्रिय खेल था। डर फैलाओ मौज करो मूल मंत्र था।
मध्य वर्ग बहुत लम्बे समय से घर में सुस्ता रहा था। बाकी जनता भी कमा खा रही थी। इस आराम से मुझे सख्त नफरत है। मैं चौबीस घंटे काम कर रहा हूँ और हिन्द सो रहा है। लोग इतने चैन से जी रहे थे कि आराम से, शौक से, सुख से बीमार पड़ते थे। सिर्फ इन्हीं लोगों की गाड़ियों को पास देने के लिए मंत्रियों की गाड़ियां रोक दी जाती थीं। इन बायोलॉजिकल बीमारों को सूंघते ही मेरे तन बदन में आग की झड़झड़ी उठने लगती थी।
इनको झकझोरने के लिए मैंने नोटबंदी का ऐलान कर दिया। नोटों की गड्डियों पर सोए मध्य उच्च और अमध्य वर्ग जाग उठे। छोटे मोटे साहूकार भी अपनी थान से हिलते नहीं थे। वे चुत्तर उठाकर बैंक की लाइन में लगे दिखे। कुछ को पक्षाघात हुआ, कुछ का हार्ट फेल, कुछ सोचते ही तेल हो गए। यों समझिए कि पाँच दस परसेंट आबादी पर असर पड़ा। पब्लिक अब भी खा पी रही थी।
ये बाहर सड़क किनारे ख़ाऊ बाजार बनाकर भकोसते लोगों को देखकर मुझे अपने बचपन की दुश्वारियां याद आ जाती थीं। मैं ऐसा कभी नहीं कर सका और न कर पाऊंगा। जिस भी होटल, रेस्तरां में जाओ, वही खाकर पेट फुलाता मध्यवर्ग।
मैंने जी एस टी लागू कर दिया। फड़फड़ उड़ता मध्य व्यवसाई वर्ग अब कुछ पकड़ में आया। लेकिन ये सब जी एस टी भी झेल गया तो?
भविष्य और अतीत में आना जाना हमारे लिए चुटकी बजाने जैसा था। हम जब चाहते हजारों साल पुराने अतीत को उखाड़कर वर्तमान में लाकर खड़ा कर देते। हम लोग इनोवेटिव थे। अतीत को जैसा चाहते वैसा बना देते थे।
क्षेत्रफल के हिसाब से भारत की आबादी बहुत ज्यादा हो गई थी। आबादी में एक नंबर पर रहने वाले चीन को हम हराने ही वाले थे कि कोरोना वायरस आ गया। इसका उत्पादन चीन में हुआ और प्रयोग परीक्षण में एक पूरे शहर को तबाह कर दिया गया। पड़ोसी होने के चलते हमें तुरत लाभ प्राप्त हो गया और तुरत कोरोना वायरस आयात कर लिया गया। जबकि एशिया के मुस्लिम आबादी वाले देशों में इसकी कम खबर हुई और वायरस यूरोप और अमेरिका पहुंच गया। आपसी संवाद और नॉन बायोलॉजिकल अनुबंध के चलते वायरस बाजार में उतारने के पहले ही हमलोग दवाई बना चुके थे।
इस बायोलॉजिकल जनता को दवाई देना जरूरी हो गया था। ये सत्य और न्याय के लिए मुंह खोलने लगी थी। मुंह पर जाब लगा दिया गया। मास्क को ही हिंदी में जाब कहते हैं लेकिन ये पशुओं के थूथन पर लगाया जाता है जब उन्हें किसी की फसल पर मुंह मारने से रोकना हो। जाब रस्सी से बुना जाता है और बुनावट के घर इंच भर के होते हैं। कुछ तेज पशु उस छेद में से जीभ घसेटकर एक आध टूईंया चोंथ ही लेते हैं।
डर फैलाने में बहुत मेहनत हुई। बहुत दिमाग खर्च हुआ। दिल की जरूरत थी नहीं क्योंकि वह हमारे पास था नहीं। पैसा खूब लगा जो हमारे पास खूब था। वायरस के वीडियो, ऑडियो, कहानियां खूब फैलाई गईं और तीन महीने के भीतर वैक्सिन बाजार में ला दिया गया। पांच दस परसेंट तो वैक्सिन लगने के पहले ही निकल लिए जो या तो सीवियर पेशेंट थे या अति डरपोक या मरण आकांक्षी। वैक्सीन के पहले डोज से अपेक्षाकृत रिजल्ट नहीं मिला तो जाँच करवाई गई।
जांच में पता चला कि भारत में अस्सी प्रतिशत लोग जो पानी पीते हैं, उसे एक दिन यूरोप को पिला दिया जाए तो वहां की आधी आबादी साफ हो जाएगी और आधी पेचिश की मरीज हो जाएगी। पता चला कि हिंद वासियों के पेट में पहले से ही अनेक वायरस हैं और मजे से हैं। वहां तमिल, तेलुगु, मलयालम, मराठी, हिंदी, बंगला, उड़िया अनेक भाषाएं बोलने वाले वायरस के बीच जब अर्धमृत चीनी वायरस गया तो वे उसे मिठाई समझकर खा गए। वह बेचारा चाइनीज में चिल्लाता रहा वे उसे हिंदुस्तानी में चूस लिए। रह गई कंकाल स्मृति। तब हमने स्कूल से दफ्तर तक, हवाई अड्डे, रेल से रिक्शा स्टैंड तक घेर घार कर दूसरा डोज लगवाया। इस बार वायरस को थोड़ा लंगड़ा लूला करके ठेला गया। ये बेचारा अपने अग्रज की ठठरियां देखते ही हार्ट अटैक से मर गया। तब हमने तीसरा और सबसे तगड़ा बूस्टर डोज ठोंक दिया जिसमें स्पेस यान में प्रयुक्त होने वाले एक धातु के अणु को मिला दिया गया जो भविष्य में औचक मृत्यु का कारण बना।
फिर भी मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि भारत में अधिकांश मृत्यु भय और पुराने सुखी रोगियों को समय पर इलाज नहीं मिलने के चलते हुई।
अणु डोज अब असर दिखा रहा है। लोग हंसते खेलते मर जा रहे हैं। कविता सुनाते, गीत गाते, जन्मदिन मनाते, शादी ब्याह में कमर मटकाते लोग निकल ले रहे थे। मैं जानता हूँ कि आबादी कंट्रोल हो गई है इसीलिए मैंने जनगणना नहीं होने दिया, न जीते जी होने दूंगा।
वैक्सीन के नाम पर पानी भी बहुत बेचा गया। भाग्यशाली हैं वे जिनको पानी डोज लग गया। जो बच गए उनको भी छोड़ना नहीं है। पानी में, दूध में, जूस में चाहे जैसे भी उन्हें भी वैक्सीनेट कर देना हमारी कोशिश है।
जब मैं बच्चा था, मैंने पूरे देश को नाचते देखा था। उसमें देवता और दानव दोनों थे। उसमें आर्य, द्रविड़, शक और हूण भी थे। मैं जहां जाता था वही स्थान मेरी जन्मभूमि हो जाती थी। मैं सबका समान रूप से रक्त सम्बन्धी था क्योंकि क्रमशः सबका रक्तपान भी नियत था। कत्ल करने से पहले मुर्गे की बांग सुनना मेरा शौक था। बर्बाद करने से पहले ताली बजवा लेना मेरी स्टाइल थी। यह स्टाइल मैंने अपने दोस्त डंब से सीखी थी।
मैक्सिको की प्रधानमंत्री ने अमेरिका में मंच से डम्ब का आभार व्यक्त किया और कहा कि डम्ब ने कहा है कि मैक्सिको इज नो मोर ऑर बैकयार्ड! इस बात के लिए मैक्सिको उनका आभारी है।
उसके बाद डम्बू मंच पर आया और बोला – मैक्सिको इज नो मोर ऑर बैकयार्ड नाऊ इट्स ऑर फ्रंट यार्ड!
तो यही हमारी स्टाइल थी। हम सब नॉन बायोलॉजिकल इसी तरीके से सोचते थे।
मैक्सिको के मीडिया प्रतिनिधि ने मेरे प्रतिनिधि से प्रश्न किया – व्हाई ही इस सो पॉपुलर इन इंडिया?
बीकॉज ही एंटरटेन इंडियंस। इंडियन लव्स इंटरटेनमेंट ऐंड इंटरटेनर्स। ही इज द बेस्ट एंटरटेनर ऑफ सेंचुरी। मेरे प्रतिनिधि ने कहा। एक जवाब में ही उसकी बोलती बंद हो गई।
मैंने गणित में, विज्ञान में, स्पेस साइंस और फाइटर यान में, दर्शन में, धर्म में, शिक्षा और व्यवसाय में मनोरंजक विचार व्यक्त किए। मैं एक ऐसी युवा पीढ़ी का पुरोधा बना जो रील बनाकर, यू ट्यूब चैनल बनाकर और पकौड़े छानकर कमाने लगी थी।
पैंतीस साल तक मैंने भीख मांगकर खाया और तीस साल मैंने हिमालय में तपस्या किया। बीच में समय निकालकर इंटायर पॉलिटिकल साइंस में दिल्ली विश्व विद्यालय से एम ए कर लिया। हालांकि इस तरह का कोई विषय अभी तक किसी जगह पढ़ाया भी जाता था कि नहीं, शोध का विषय था, जिसपर पत्रकार काम कर रहे हैं। यह विषय पचास साल बाद पढ़ाया जाने वाला था। लेकिन मैंने पहले ही बताया कि समय को आगे पीछे घुमा देना हमारे लिए आसान काम था।
इस मसले को सुलझाने के लिए मैंने गोरखनाथ, नानकदेव और कबीर दास की मगहर में मीटिंग बुला दी। लोगों को आश्चर्य हुआ। इनके अवतरण और प्रस्थान के बीच सौ दो सौ साल के फासले हैं। मैंने एक मिनट में सुलझा दिया।
समय को आगे पीछे करने की आदत मुझे बचपन में ही लग गई।
अक्सर मैं देर से घर लौटता था। मां दरवाजा खोलती और घड़ी की ओर देखे बिना सोने चली जाती थी। घर में एक ही घड़ी थी जो बाहर के कमरे में लगी हुई थी। उसका शीशा टूट गया था। थोड़ी देर बाद पिता समय जानने के लिए आते थे। उससे पहले मैं समय की सुईयों को अपनी जरूरत के हिसाब से सेट कर देता था। कई साल तक मैं घड़ी की सुई घुमाकर पिता को घुमाता रहा। एक दिन कुछ ज्यादा ही देर हो गई थी। ज्योही मैंने समय को दुरुस्त कर सोने के लिए चादर तानी कि फजिर की नमाज़ गूंज उठी। पिताजी ने मेरी चोरी पकड़ ली। इसके कुसूरवार नमाजी थे। उसी समय मुझे इस कौम से नफरत हो गई।
राजनीति को हमने एक ऐसे खेल में बदल दिया जिसमें जनता दर्शकों में बदल गई। ऐसे समझिए कि वॉलीबॉल में एक टीम दूसरे टीम की तरफ गेंद उछाल रही है और जनता बीच में है। जो बाल पकड़ लेगा उसे इनाम दिया जाएगा और बाल हम जिसे चाहते हैं वही पकड़ता है। जनता भी इस खेल की आदी हो चुकी थी। प्रजातंत्र सबसे जरूरी हथियार साबित हुआ हमारे खेल में।
उम्र बढ़ने के साथ मुझपर यह ज़ाहिर होता गया कि न सिर्फ मैं नॉन बायोलॉजिकल हूँ बल्कि इंसान ही नहीं हूँ। मैं अवतार हूँ। अगर समुद्र मंथन के समय ही मुझे पैदा होने दिया गया होता तो मैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि से अधिक पूजित होता।
मुझे भगवान मानने वालों के प्रति मुझे सदय होना चाहिए लेकिन उल्टा होता है। मैं भगवान से ऊपर हूँ, जिसे यह नहीं समझ में आता है उन्हें मैं बख़्श देना गुनाह समझता हूँ। डर और लालच के अमोघ अस्र से मैं इस देव भूमि की दरिद्र जनता का शिकार करता हूँ।
मैं अजर अमर हूँ। अवध्य हूँ। मैं इस पृथ्वी को रसातल तक पहुंचा कर दम लूंगा जिसने मुझे सम्मान नहीं दिया। मेरे दोस्त डम्ब को और मुझे नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला तो देखना और क्या क्या होता है।
लेकिन अब मैं अपने नॉन बायोलॉजिकल होने से थकने लगा हूँ। जल्द ही मेरी थकान का फायदा उठाकर दुनिया भर के पत्रकार मेरी बायोलॉजिकल गतिविधियों का रिकॉर्ड दुनिया के सामने प्रसारित करेंगे।
आज के पचास सौ साल बाद हमारे वर्तमान समय के बारे में इस तरह पढ़ाया जायेगा -
"एक थे मूडी जी! उनके राज्य में घरों में ताला नहीं लगता था क्योंकि घरों में कुछ था ही नहीं. उन्होंने भारत की जनसँख्या को थोड़े ही दिनों में औसत सीमा के बहुत नीचे पहुँचा दिया. करोडो लोग भूख से मर गए क्योंकि खाने को कुछ था ही नहीं। उनके राज्य में लोग धार्मिक हो गए क्योंकि फकीरी के सिवा कोई व्यवसाय बचा नहीं था जो फायदा दे सके ." ...
जय श्री सीताराम!
क्या कहते हैं आप ?आप भी कुछ विचार उगलिए !
अनुपम ओझा
पैगम्बरपुर, बड़का सिंघनपुरा, बक्सर
बिहार, ८० २१ २०
सम्पर्क : ९९३६०७८०२९
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