मंगलवार, 5 जुलाई 2011

निर्देशक की डायरी 3 / फिल्म निर्देशक मीडिया है न की लेखक मीडिया आज ये सब जानते हैं. चलिए माना की लेखक नहीं हैं. तो क्या हुआ ? निर्देशक हैं न ? या वास्तव में निर्देशक नहीं हैं ? और प्रोड्यूसर भी नहीं हैं ? क्योकि "हमारी फिल्म इंडस्ट्री में सबके पास एक कहानी होती है लेखक को छोड़कर " - भगवती चरण वर्मा ने १९५० में लिखा था ! आज भी हम वही हैं! निर्देशक, अभिनेता, संगीत, कला सबके महत्त्व और रचनाशीलता को सब पहचानते और सराहते हैं. लेकिन क्या अबतक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रोड्यूसर के महत्त्व को समझने की कोशिश की गई है? क्या कभी इस पर विचार किया गया है की 'प्रोड्यूसर मे बी अ क्रिएटिव पोस्ट'. अक्चुअली प्रोड्यूसर इज अ क्रिएटिव पोस्ट इन एंटायर फिल्म वर्ल्ड. लेकिन हमारी फिल्म इंडस्ट्री में


निर्देशक की डायरी 3
फिल्म इंडस्ट्री में अच्छे लेखक नहीं है - अमिताभ बच्चन.
अब लगता है की लेखक खोजने फिल्म इंडस्ट्री से बाहर ही जाना होगा- राहुल बोस.
 सिर्फ पिछले एक सप्ताह में बड़े और गंभीर फिल्म कर्मियों  से लेकर दर्जन भर छूटभैयों ने भी यही बात दोहराई हैं. इस बात को मै काफी अरसे से सुनता आ रहा हूँ.  सन २००० में इंडिया डे एंड नाईट में मैंने आमिर खान का सन्दर्भ रखकर 'हिन्दी सिनेमा में पटकथा की व्यथा' नाम से एक सारगर्भित लेख लिखा था.  नए सिरे से कुछ बातें कह रहा हूँ. 

फिल्म निर्देशक मीडिया है न की लेखक मीडिया आज ये सब जानते हैं. 
चलिए  माना की लेखक नहीं हैं. तो क्या हुआ ? निर्देशक हैं न ? 
या वास्तव में निर्देशक नहीं हैं ? और प्रोड्यूसर भी नहीं हैं ? क्योकि "हमारी फिल्म इंडस्ट्री में सबके पास एक कहानी होती है लेखक को छोड़कर " - भगवती चरण वर्मा ने १९५० में लिखा था ! आज भी हम वही हैं!
 निर्देशक, अभिनेता, संगीत, कला सबके महत्त्व और रचनाशीलता को सब पहचानते और सराहते हैं. लेकिन क्या अबतक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रोड्यूसर के महत्त्व को समझने की कोशिश की गई है? क्या कभी इस पर विचार किया गया है की 'प्रोड्यूसर मे बी अ क्रिएटिव पोस्ट'. अक्चुअली प्रोड्यूसर इज अ क्रिएटिव पोस्ट इन एंटायर फिल्म वर्ल्ड. लेकिन हमारी फिल्म इंडस्ट्री में जो भी पैसा लगाता है वह प्रोड्यूसर होता है और जो भी पैसा या स्टार ला सकता है वह डाइरेक्टर होता है. यह आम प्रचलन है. हर साल आठ सौ हजार फिल्मों में से नब्बे प्रतिशत अगर हम औसत सिनेमा बनाते हैं तो इसका कारण राइटर नहीं है ! क्यों की राइटर को डाइरेक्टर और प्रोड्यूसर अपोइन्ट करते हैं. राइटर भी म्यूजिक डाइरेक्टर और फाईट डाइरेक्टर या आर्ट डाइरेक्टर की तरह फिल्म का एक सहकर्मी होता है न की मेकर ?

हमारी इंडस्ट्री में ओरीजिनल डाइरेक्टर की भारी कमी है; जिनके पास अपनी कोई सोच, कोई आईडिया हो जिसे डेवलप करने के लिए सच्चे लेखक की जरुरत हो. हमारे यहाँ नकली डाइरेक्टर हैं जिन्हें किसी बाहरी फिल्म को हिंदी में छापना होता है. उनमें नए विषय को धारण करने की शक्ति नहीं होती. उनके पास गर्भ नहीं होता जहाँ विचार विन्दु को धारण कर सकें. ऐसे महत्व के रोगी सो काल्ड डाइरेक्टर लोग मुंशी नुमा लोगों को खोजते है जो चोरी में सफाई से साथ दें. इसीलिए हमारी फिल्म इंडस्ट्री का सर्वप्रिय सब्जेक्ट आजतक अपराध बना हुआ है.अपराध और हिंसा तो जैसे एंट्रेंस एक्जाम है जिसको पास करके ही कोई अभिनेता बन सकता है. कमाल की इंडस्ट्री है भाई नब्बे प्रतिशत नकल पर चल रही है और चकाचक चल रही है!!
फिल्म लेखक का मिडिया नहीं है तो यहाँ लेखक नहीं हैं . इसमें क्या आश्चर्य है. गट्स वाले अभिनेता तो है ना जो सिर्फ ओरीजिनल स्क्रिप्ट करते हैं ? जो धंधे पर ही नहीं उतर गए हैं? लेखक कभी नहीं थे और हमेशा थे उन्हें फिल्म लेखन के लिए निर्देशक या प्रोड्यूसर आमंत्रित करते हैं. क्या उम्मीद करते हैं आप की  कोई भी लेखक फिल्म इंडस्ट्री में आकर दुबारा से लेखक बनने का संघर्स शुरू कर दे ? अभिनेता और निर्देशक के लिए जा जाकर अपने आप को इंट्रोड्यूस करना सही है क्योंकि वे फिल्म माध्यम से ही अपना परिचय दे सकते हैं लेकिन एक लेखक तो साहित्य, पत्रकारिता आदि माध्यमों से भी अपनी योग्यता का संकेत दे सकता है. लेखक को हमेशा बुलाया जाना चाहिए. यह बुलाना भी तभी संभव है जब निर्देशक और प्रोड्यूसर भी जागरूक और रचनात्मक हों ! क्या ऐसे निर्माता हैं सर ?
बी आर चोपड़ा ने कमलेश्वर को फिल्म लिखने के लिए बुलाया और सिखाया भी. वे विमल राय थे जिन्होंने नवेंदु घोस, गुलजार, बासु चटर्जी, बासु भट्टाचार्य और न जाने कितने लेखकों, निर्देशकों, कलकारों को संरक्षण दिया. 
मै बच्चन साहब से पूछना चाहता हूँ की आपकी पीढ़ी तो भाग्यशाली थी जब ख्वाजा अहमद अब्बास  जैसे लेखक निर्देशन कर रहे थे. हमें क्या मिला है.
राहुल बोस तो खुद बहुत बढ़िया लेखक है . मैंने उनकी एक स्क्रिप्ट पढ़ी थी. उन्होंने लिओ तोल्स्तोय की किताब अन्ना कारेनिना को हिंदी सीरियल के लिए रूपांतरित(Adapt ) किया था. कमाल का भारतीयकरण किया था इन्होने. तब मै एक टीवी चैनल में काम करता था. मै इस के बनने के पक्ष में था. किन्ही कारणों से एक आला अधिकारी राहुल के पक्ष में नहीं था. मैंने इसी बात पर स्क्रिप्ट सलेक्शन का काम छोड़ दिया. बाद में नौकरी छोड़ दी. मै राहुल से पूछना चाहता हूँ की वे खुद इतने अच्छे लेखक हैं, आपको कितनी फिल्में औफर होती हैं ? 

तो मामला ये नहीं है की लेखक नहीं है; हुजूर! प्रोड्यूसर और निर्देशक नहीं है जैसा की मै समझ रहा हूँ.            

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

निर्देशक की डायरी २


निर्देशक की डायरी २
जिस पहले नाटक में मैंने एक अभिनेता के तौर पर पार्टिसिपेट किया था उसे मेरे भैया देव जी ने लिखा था. नाटक का नाम था 'प्राण जाये पर वचन न जाये' . तब मै बारह - तेरह साल का रहा होऊंगा. मैंने उसमे एक अच्छे राजा का रोल किया था जो अपनी अच्छाई के लिए कुर्बानियां देता है और दर दर की ठोकरें  खाता है. मेरे एक दोस्त ने बुरे राजा का रोल किया था. एक और साथी ने विपत्ति का रोल किया था. नाटक सफल था. इसके बारे में विस्तार से लिखूंगा.
 फ़िलहाल एक जरूरी फिल्म लिख रहा हूँ.
 जब डेडलाइन तय कर के मै कुछ लिखता हूँ तो टीवी, सिनेमा, नेट, फोन, दोस्त यार, प्यार व्यार सबसे जुदा होता हूँ. इसी माटी पानी से बनाये अपने सबसे प्यारे मित्रों यानि चरित्रों के साथ दिन रात रहता हूँ. बहुत खडूस टाइप दीखता और होता हूँ क्योंकि इसी संसार की प्रतिलिपि एक दूसरा संसार रच रहा होता हूँ.
 कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू . सिनेमा इस द वर्क ऑफ़ ओउतर. इन सब बातों की सविस्तार व्याख्या करूँगा.  मगर तीस जुलाई तक एक नया संसार, एक नयी फिल्म मुझे कागज पर बना देना है. तो तबतक मै कम दिखूंगा और कम लिखूंगा.
निर्देशक की डायरी  लिखने का समय निकालने की कोशिश करूँगा.
शुभकामनायें.

निर्देशक की डायरी



निर्देशक की डायरी
श्याम बेनेगल ने ४२ साल की उम्र में अपनी पहली फीचर फिल्म डाइरेक्ट की थी. तबतक वे एक हजार से ज्यादा ऐड फिल्में बना चुके थे. मैं ४१ साल का हो गया हूँ और अबतक पाँच सौ से ज्यादा टी वी प्रोमो बना चूका हूँ और तीन शोर्ट फिल्में. मैंने अपने लिए श्याम जी की ही नियति चुनी है. एक ज्योतिषी की बात मानें तो उन्होंने मुझे सन २००१ में लिख कर दिया है की फिल्म में लेखक बन्ने की मेरी सारी कोशिशें नाकाम हो जायेंगी क्योंकि तुम्हारी नियति निर्देशन है. थियेटर से टी वी और अब सिनेमा तक ये बात सच साबित दिख रही  है. न मानते हुए भी ज्योतिष को मानना पड़ रहा है.
बहुत शुरुआत से ही किसी दल का हिस्सा बनने की जगह अपना कुछ करना मुझे पसंद रहा है. साहित्य में बड़े संगठनों का हिस्सा बनने की जगह मैंने अपनी मंडली समाधान समूह बनाकर १९८५ से २००० तक उसे विधिवत चलाया. चुकी वह छात्र जीवन का हिस्सा था इसलिए बनारस हिन्दू  विश्व विद्यालय से निकलने से पहले  कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया. समाधान की तरफ से मैंने आख़िरी कार्यक्रम १९९९ के अंत में आयोजित किया था - बनारस के दस कवियों का एकल काव्यपाठ. वह सफल रहा और उसके सारे दस्तावेज श्री अवधेश प्रधान जी ने मांग लिए. योजना उन कविताओं को प्रकाशित करने की थी जिसका अब कुछ पता नहीं.
साहित्य और रंगमंच की तुलना में सिनेमा तत्काल प्रभावी है. यही बात मुझे सिनेमा की तरफ ले आई. यहाँ आकर मै एक गुमनाम लेखक और अल्पनाम निर्देशक तो बन गया लेकिन जिन गिने चुने निर्माताओं से मिला वहां सिर्फ समय और विचार नष्ट हुए.
अब मैंने अपना प्रोडक्शन हाउस भी शुरू कर दिया है. मेरी नियति है की मै अपना संगठन बनाकर ही कुछ कर पता हूँ. दर असल मै रचनात्मक स्वतंत्रता से समझौता भी कर लूँ तो सामने वाले को यकीन नहीं होता. और अगर मै अपनी पूरी प्रतिभा का प्रदर्शन करूँ तो वह भी नहीं पचता.
सिनेमा पर शोध और पिछले दस साल के व्यवहारिक अनुभव के साथ मैं इतना संपन्न हूँ की सिनेमा को एक फेरी वाले की तरह घूम धूम कर पूरे उत्तर भारत में फैला दूंगा.मैंने अपने प्रोडक्शन का नाम फेरीवाला फिल्म प्रोडक्शनस रक्खा है. कैसा है?
ज्योतिषी की बात में सचाई है भाई. मानना पड़ेगा.






शनिवार, 25 जून 2011

सुंदर

सुंदर
यह शब्द 
 अथक
सदियों तक 
 चलता रहा
अपने अर्थ की ओर
जो तुम हो.
तुम्हे पाकर 
सुंदर अर्थ पा गया. 
तुम्हारे कन्धों पर सो गया 
तुम्हारे रूप पर छ गया.
सुंदर
हाँ, सुंदर हो तुम.

गुरुवार, 9 जून 2011

महान मकबूल फ़िदा हुसैन को मेरी श्रद्द्धान्जली ! मेरा नमन !

महान मकबूल फ़िदा हुसैन को मेरी श्रद्द्धान्जली ! मेरा नमन !

हुसैन साहब नहीं रहे . कुछ लिखना चाहिए!
 क्या लिखूं ?
 श्रधांजलि दूँ  ?
 शोक मनाऊं ?
 अपनी उम्र के आखिरी दशक में वे अपने देश, अपनी माटी में लौटना चाहते थे. वे मर गए या उन्हें मार दिया गया ? इसकी सुनवाई किस कोर्ट में होगी ?
 मक़बूल फ़िदा हुसैन जैसा चोटी का कलाकार, जिसने विश्व कला के आकाश पर भारत का सर सबसे ऊपर उठा दिया ! जो भारत के लिए जिया और भारत के लिए, अपने वतन के लिए तड़प कर मर गया.

वे मर गए या उन्हें मारा गया?
कुछ चवन्नी छाप अपराधियों ने उनके चित्रों के मूल्यांकन का आत्मविश्वास कहाँ से पाया ? इसकी जाँच किस न्यायलय में होगी ?
 भारतीय कला का मर्म समझने के लिए सिर्फ देवी देवताओं के प्रति अंधी श्रद्धा ही काफी है?
 फिर विश्व विद्यालयों में प्राचीन इतिहास और कला के इतने बड़े बड़े डिपार्टमेंट किस लिए खोल रक्खे गए हैं ? 

मंदिरों के बाहर की दीवारों पर असीम श्रद्धा से उकेरे गए सभी देवी देवताओं के काम चित्रों को जिसने भी ध्यान से देखा है, वही मंदिर में धुले मन से जा सकता है और भारत के मकबूल फ़िदा हुसैन ऐसे ही थे. सभी चीजों का मर्म जानते थे. सीता पर सिरीज बनाते हुए उनके लिए सारी दुनिया ही निर्दोष हो गई ! उन्होंने हमेशा के लिए चप्पलें उतार दीं ! और अजीब बात है कि सीता पर सिरीज भी उन्होंने लन्दन में ही बनाया था. और लन्दन में ही उन्होंने अंतिम साँस ली !

 किसी कुशल बाजीगर कि तरह जिन्दगी की डोर पर सधे पाँव खड़े  हमारे हुसैन साहब को एक जाति ने दूसरी जाति की तरफ धक्का मारा  और वह भी उनके चौथेपन में. चालीस साल के हुसैन से टकरा के देखा होता तो पता चलता की हुसैन का मतलब क्या होता है. और उस उम्र में भी वे जवाब दे सकते थे. लेकिन समय के मूल्य को समझते हुए उन्होंने अपना  काम जारी रखना जरूरी समझा इन लफंगों को जवाब देने की जगह !


 सरस्वती पर बनाये जिस चित्र का मूल्यांकन करने जो लोग गए थे क्या वे सरस्वती के हुसैन से बड़े बेटे थे ? वे किस कला में पारंगत थे? वे कलाकार थे या कला समीक्षक ? क्या किसी भी प्राचीन इतिहास और  कला के पारखी से ऐसी बेहूदा हरक़त की उम्मीद की जा सकती है की गैलरी तोड़ दे ?

 हुसैन से ज्यादा जमीनी होने का दावा  सिर्फ जातिगत आधार पर करने की गुंडागर्दी करने वाला सिस्टम आज बदरंग हो गया है.  यह बदरंग हमने किया है जबकि मकबूल फ़िदा हुसैन ने जबसे  ब्रश उठाया है अपने देश को असंख्य रंगों में रंगा है. हम बदकिस्मत हैं  कि कला के अनोखे व्यक्तित्व को, सरस्वती के सच्चे साधक को, अपने एक विशिष्ट 'युवा - बुजुर्ग' को भ्रष्ट व्यवस्था के हवाले छोड़ दिया. सरस्वती तो उनकी  तूलिका में ही  रहती थीं. 
मुझे लगता है कि उनसे व्यक्तिगत विद्वेष का हिसाब किया गया. हर राम के साथ एक रावण तो होता ही है. हर कहानी में एक खलनायक तो होता ही है. महान मकबूल फ़िदा हुसैन को अपने जीवन के अंतिम दशक में अपना देश छोड़ने, क़तर कि नागरिकता लेने, लन्दन में अपने देश , अपने रंग, अपने सब्जेक्ट के लिए घुटकर मरने के लिए मजबूर करने वाला वह महान खलनायक समाज तंत्र, राजनीति, व्यवस्था और हम सब दोषी है. 
अगर वे अपने देश लौट आते तो कम  से कम  १२० साल की उम्र जीते ! वैसे तो उनकी उम्र का क्या हिसाब ! वे अमर हैं ! 
मेरी श्रद्द्धान्जली ! मेरा नमन !

मंगलवार, 24 मई 2011

एक अधूरा गीत ..


एक अधूरा गीत ..
मै जिए जा रहा हूँ अलग किस्म की तरह
देखा ही नहीं तुमको कभी जिस्म की तरह. 

तौला ही नहीं तुझको कभी मोल की तरह
दिल में सम्हाल रक्खा है अनमोल की तरह 
परखा ही नहीं तुमको कभी वक़्त की तरह
महसूस किया है हमेशा रक्त की तरह.

मै जिए जा रहा हूँ अलग किस्म की तरह..

सोमवार, 16 मई 2011

कलाकार की आत्मा


कलाकार की आत्मा 
अनुपम 
सोचता था एक और जन्म लूं 
क्योंकि यह तो खुद को समझाने में निकल गया 
जब नजर खुली
 दिन ढल गया;

सोचा फिर खुले दिमाग से -
नजर तो खुली ,
जो अगले जनम में वो अभी क्यों नहीं ?
और यों हमने
 ढलते दिन को थाम लिया!

चालीस तक
खिलाड़ी और सैनिक की उम्र 
समाप्त हो जाती है 

पैतीस से चालीस के बीच पक्का होता है 
एक कलाकार.