शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

मै नहीं लिखता ... अनुपम ( १२-०९-२०१, मुंबई )


नीलकमल के नोट्स से ---
'तो कविता भी उसी नारियल के पानी जैसी चीज़ होनी चाहिए ।
कहने का अर्थ यह कतई नहीं है कि कवि कोई जादूगर होता है । ऐसा तो बिलकुल भी नहीं है । लेकिन कविता की रचना प्रक्रिया में कहीं न कहीं वह बात अवश्य है कि "देयर इज़ समथिंग मैजिकल इन इट" । आखिर क्यों बड़े से बड़े कवि के लिए भी हर बार बड़ी कविता लिखना कठिन होता है । क्यों किसी बिलकुल नए कवि की एक कविता वह बात कह जाती है जो पहले किसे ने उस ढंग से नहीं कही । क्यों आखिर , "कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए-बयाँ और" । बहुत सम्भव है कि कवि होना व्यक्ति का खुद का चुनाव न हो बल्कि कविता ने स्वयं ही उसे अपने लिए चुन लिया हो ।'(नील कमल, कविता की रचना प्रक्रिया.)
कविता की रचना प्रक्रिया पर नीलकमल का अद्भुत आलेख पढने के बाद हाल ही में लिखी इस कविता को प्रकाशित करना जरूरी हो गया. 

कविता की रचना प्रक्रिया पर मैंने कई कवितायें लिखी हैं 
और उस खास बात को पकड़ लेने की कोशिश की है.'निज में बसने कस लेने' की कोशिश की है और भी हैं लेकिन यह दो सप्ताह पहले की रचना है. लीजिये, कविता की रचना प्रक्रिया के कठघरे में मै भी हाजिर हूँ .

कविता 

मै नहीं लिखता ...                              अनुपम
                                               ( १२-०९-२०१, मुंबई )

नहीं भाई नहीं, मैं कवितायें नहीं लिखता 
(पटकथाएं नहीं लिखता)
मेरी खुशियाँ तो कहीं गाँव घर में रह गईं 
मेरा आनंद बनारस की गलियों में खो गया.

नहीं, भाई नहीं,
मै नहीं लिखता...

कवितायें मुझे लिखती हैं 
मेरे एकांत में खलल डालती हैं 
कहानियाँ मुझे चुनती हैं,
 चरित्र मुझे आकर मांगते हैं .


मै गया था रवीन्द्र नाथ टैगोर के पास
लिओ तोलस्तोय के पास 
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के पास ;
गंगा जमुना की रेती छानता रहा वर्षों 
काव नदी की छिछली 
गोमती की गहरी लहरों को पढता रहा 
किनारा बन पीता रहा नदियों को
सदियों को 

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय 
और 
गजानन माधव मुक्तिबोध 
का संग छोड़ 

मै धूमिल के साथ एक पेड़ के नीचे बैठ गया.
धूमिल
कहीं से एक कील खोजकर लाया 
एक झंवाये टुकड़े से 
वह अपनी टूटी हुई चप्पल गांठने लगा,
मुझे मोचीराम दिखा 
उसके साथ मै रैदास के जूतालय में चिलम फूँक आया 
सभी हकीम लुक्मानो से मिल आया,
और अंत में कबीर से पता चला -
इसकी कोई दवा नहीं,
जब इन्होने ही तुम्हे चुना है

अभिशाप हो या वरदान

मै नहीं लिखता 
इनका चाकर हूँ मै
नहीं दीखता चक्कर मेरे पांवों में 
मेरे भावों में 
विचारों के जाल में नहीं टिकती नन्ही मछलियाँ 
जो मुझे पसंद हैं...

नहीं भाई नहीं 
मै नहीं ...
(सिर्फ वही) . 



गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

'भोर' की कहानी सचमुच सपने में ही देखी थी.

निर्देशक  की डायरी १२
मेरे ड्रीम प्रोजेक्ट 'भोर' द अर्ली  मॉर्निंग के लिए लक्ष्मी माता के दरवाजे खुले...
'भोर' की  कहानी सचमुच सपने में ही देखी  थी.
सपना-- 'मै पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की एक कहानी पढ़ रहा हूँ, एक जोतिहर किसान की कहानी जिसके प्रेम और प्रयासों ने एक गाँव को बदल दिया. यह किसी पत्रिका में प्रकाशित है.' जागने के बाद मेरी नजर मेरे बिस्तर पर बैठे के मित्र पर पड़ी. शायद मै ज्यादा देर सो गया था. वह चिंतित सा बगल में बैठा था. यह वह समय था जब फिल्म पर अपनी पढ़ाई पूरी कर चुका था और कहानी ढूंढ़ रहा था. मैंने दोस्त से पूछा - क्या हरिप्रसाद चौरसिया कहानी लिखते हैं?
क्या बक रहे हो, वे बांसुरी बजाते हैं - दोस्त ने कहा. वह मेरे देर तक सोने से चिढ़ा हुआ था.
तो ठीक है, ये कहानी मेरी है - मैंने कहा. 
कौन सी कहानी?
'वही जो मैंने सपने में पढ़ी. '
आँख खोले बिना मैंने उसको पूरी कहानी सुनाई और उसे हमने कागज़ पर लिख लिया. आठ महीने तक हम दोनों बिहार और यू पी के गांवों में  घूमकर सभी तरह की लोक कथाओं और गीतों को संकलित करते रहे और कई वर्ष के प्रयास से यह स्क्रिप्ट तैयार हुई. बीच में एक दुर्घटना भी हुई - गीतों, कहानियों के टेप और डायरियां, फाइलें लेकर हम अपनी पहली बम्बई यात्रा पर चले तो किसी चोर महाशय ने मोटा माल समझकर अटैची उड़ा ली. हम वापस हो गए. लेकिन हारे नहीं. सिर्फ दो महीने में हमने फिर से लगभग सबकुछ वापस जुटा लिया क्योंकि अब हम स्थानों को जानते थे.
मैंने एक  बार पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी को फोन किया और कहा की सपने में पढ़ी उनकी कहानी पर फिल्म बना रहा हूँ. काफी मनोरंजक बातचीत हुई. मैंने कहानी के लिए उन्हें मेहनताना भी देने की पेशकश की. जाहिर है संगीत में उनका योगदान रहेगा.
कदम बढाने से रास्ते खुलते हैं, सुना था, आज देखा. कई बार हम दरवाजे को कई साल तक एक ही तरीके से खोलते रहते हैं और वह नहीं खुलता. तरीका बदलते ही बात बन जाती है. पिछले ११ साल के बम्बई प्रवास में मैंने ४ स्क्रिप्ट तैयार किया. एकदम परफेक्ट तरीके से और प्रोड्यूसर खोजता रहा. कल दोपहर में पहली बार फिनान्सर के लिए आवाज लगाईं और आज दोपहर तक मेरे पास फिनांस आ गया.  इसमें मेरे लिए कोई चमत्कार नहीं है, यह मेरी यात्रा के इस पड़ाव का सीधा रिजल्ट है. 
 इस साल के अंत तक किसान जीवन के इस महाकाव्यात्मक फिल्म को मै फ्लोर पर ला दूंगा. इसे मै हिंदी और अंग्रेजी में एक साथ बनाऊंगा. हिंदी, इंग्लिश और भोजपुरी तीन भाषाओं में एक ही थीम पर इस फिल्म को लिखा गया है. गहन रिसर्च और न जाने कितने मित्रों और आम लोगों का कंट्रीब्यूशन है.  कबीर और मुल्ला दाउद की सरजमीं  को सिल्वर स्क्रीन पर उजागर कर देना ही इस फिल्म का उद्देश्य है. मेरे खयाल से इस तरह के काम को अंजाम देने के लिए १० साल की मेहनत को कुछ ज्यादा नहीं कहा जायेगा? यह इसलिए कह रहा हूँ कि लिखने को कुछ लोग आसान  काम समझते हैं, अगर ऐसा ही होता तो हर जेनरेशन  में दस बीस पंडित मुखराम शर्मा और सचिन भौमिक होते या कालिदास और निराला. लक्ष्मी के बेटे अपनी चवन्नी अठन्नी निकालने में भी उसकी पूरी कीमत वसूलना चाहते हैं जबकि हम सरस्वती के बेटे वर्षों की मेहनत से हासिल अमूल्य ज्ञान को भी लगभग मुफ्त में दे देते हैं. 
न दे तो अभिशप्त  ब्रह्मराक्षस बन जायेंगे.
 ज्ञान दान महादान! जय हो माई सरस्वती!  

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शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

निर्देशक की डायरी ११


निर्देशक की डायरी ११  
पुरानी डायरी का एक पेज ..
(२-८-१९९६, बिड़ला होस्टल, बनारस)
कि ऐसी चीखती कविता बनाने में लजाता हूँ . मुक्तिबोध 

लुत्ती १                                          अनुपम 
एक ही धरती पर 
एक ही देश में 
तुम अरबों खरबों घोंटने 
घोंटाने में परेशान दिखते हो
कोई पाई दो पाई के लिए 
हैरान होता है 

शत प्रतिशत बेईमानी के बाद की तलछट के लिए मारामारी 
जारी है एक आत्महंता समर्पण

एक ही धरती पर 
एक ही देश में 
हम किस संस्कृति में जी रहे हैं 
किस देश काल में 

हर दिन आपात काल का मातम क्यों 
इस हिन्दुस्तान में इतना अधिक इण्डिया क्यों ?

(संभवतः साहित्य अमृत में प्रकाशित. )

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

कवियों की पृथ्वी

कवियों की पृथ्वी 
बहुत छोटी है मित्र,

मै उस पृथ्वी पर रहना पसंद करूँगा 
जिसपर कवि/ कवी दोनों रहते हैं 
कोई भी मंच
संगठन 
समूह
बंधन 
अंटता नहीं मेरी चेतना में 

सबसे संवाद जरूरी तो नहीं !

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

व्यवस्था , अनुपम


                              व्यवस्था                      अनुपम 

 १.
ग्लोब पर चढ़ी हुई है एक चींटी
ग्लोब में घुसा हुआ है एक तिलचट्टा
एक झिंगुर लिख रहा है नए नक़्शे
पढ़ रही है एक मक्खी,

गुबरैले चला रहे है चक्की.

चल रही है व्यवस्था !...
 २.
शांत रहो ..अभी व्यस्त है वैज्ञानिक
मानवनाशी बम बनाने में -
एक सुरक्षित कंडोम तक जो नहीं बना सके !
व्यस्त है प्रधानमंत्री !
सीमा विवाद सुलझाने में .....
सभी व्यस्त है !... तुम अपनी भूखी चीख दबाओ !
दर्द पी जाओ ...
चलने दो व्यवस्था ...
3.
बम चाहे जहाँ भी फूटे
मेरे सीने में गड्ढे बढ़ते ही जाते हैं,

अमेरिका चाहे ईराक को लूटे
मेरे घर में वस्तुएं घटती ही जाती हैं.
कुवैत हो की इरान,
अफगानिस्तान या हिन्दुस्तान
भय का अंधकार
बढ़ता ही जाता है.
                                                       
  4.
चोरों ने तय किया - वे अपना संविधान बनायेंगे,
अपनी सहूलियत के लिए इस संसार में
वे अपना चोर-संसार बनायेंगे
उसकी अपनी नैतिकताएं होंगी
अपने आदर्श ; सबसे बढ़कर ये कि उसमें
जो नहीं होंगे चोर
उनके लिए भी काफी जगह होगी ....
5.
खुश है लोग
लोकल ट्रेन में ठसे हुये हैं ,
मगर खुश हैं!
पाँवों तले रौंदे जाने के बावजूद खुश हैं
तीसरी दुनियां के देशों में --
यह बात पसंद नहीं आती 'बुश' को (उस को...)
कि अभी तक लोग 
खुश हैं...

6.
हीक भर नरक के बाद
पीक भर स्वर्ग!
कमाल के दाता हो !
7.
बड़ी बड़ी होर्डिंगों पर
नगर के चौराहों पर औरत के जिस्म के
भीतर का आदमी
नाच रहा है
आदमी के भीतर की औरत
तालियाँ बजा रही है
सबकुछ
बहुत ठोस
भीतरी सूक्ष्म तल पर बदल रहा है.

8. 
सवाल ये नहीं है कि पुरुष औरत को देह समझता है
औरत भी यही समझती है
और पुरूषो कि मिलीभगत से चल रहा है कारोबार ;
देह एक प्रोडक्ट -
एक प्रोडक्ट को बेचने के लिए देह --
देह साबुन ,देह तौलिया ,देह चादर ,
देह जूस, देह चॉकलेट, देह पेट्रोल, देह मिसाइल

देह ही देह से भरी है विश्व-बाजार की फाइल !

9.
चिड़िया पक्षी गाय
बकरी दीमक चींटे
पानी खरीदने खड़े होंगे एजेंसियों में
जहाँ यंत्र स्तनों से प्रति लीटर
नापकर दूहेंगे पानी

वे एक बटन दबायेंगे
एक बूंद कम पानी भर जायेगा
वर्तन में , बूंद बूंद से
भरता रहेगा उनका समुद्री उदर....
10 .
पहले थोडा गेहूँ डालो
चक्की चला दो
फिर थोडा कंकड़ डालो
चक्की चला दो
एक झक्कास पैकेट में बंद करो
बाजार में पंहुचा दो .
चक्की चलती रहेगी!
     11.
एक जैसी इमारतें
एक जैसे कमरे
एक जैसे चेहरे
एक जैसी भाषा
एक जैसा अंदाजे-बयां

एक जैसी मौत
एक जैसी कब्र

यानि ऊब ही ऊब
बहुत खूब!
12.
भाषा से नफ़रत
शब्द से नफ़रत
शब्द में जीने वाले मन से नफ़रत
मन को रखने वाले तन से नफ़रत

'खांखर" शब्द को क्यों रख दें आंग्ल में ?
उसे वहां भी क्यों न रहने दें - जहाँ है ?

पंछियों का बदलें भूगोल
बदल दें जलवायु !
सभी पेड़ एक ऊंचाई के
सभी फूल  निर्गंध ...
13.
वे भविष्य में एक गोली दागेंगे
जिसकी आवाज वर्तमान में सुनाई देगी
और लहूलुहान होगा अतीत
फिर हमारे संग्रहालय ,पुस्तकालय  और सभी तरह के आलय
जिसमें हम अपना इतिहास रखते हैं -- जला दिए जायेंगे !
वहां लटका दी जाएँगी उनके नाम कि तख्तियाँ
हमारे हजारों साल के इतिहास को मेटकर वे अपना दो हजार साल का
इतिहास पढ़ाएंगे ; हमारी अगली पीढ़ियों को
आधुनिक बनायेंगे !
14.
पूरब के दिल में इस तरह एक सन्नाटा
फैल रहा है - जैसे पुराना बड़ा कमरा हो, जिसमें
बरसों से कोई नहीं रह रहा हो...
15.
अभिमन्यु चक्रव्यूह में फँस गया,
तुम निकल सकते हो
वह बाहर निकलना नहीं जानता था
तुम जानते हो

अभिमन्यु !
अपने जाने हुए को
समूचा दाव पर लगा गया :
हमें
बाहर निकलने का रास्ता दिखा गया!

सोमवार, 5 सितंबर 2011

लेकिन पत्रकार भाइयों ! मेरा नाम हैं बम्बई फिल्म इंडस्ट्री !


लेकिन पत्रकार भाइयों ! मेरा नाम हैं बम्बई फिल्म इंडस्ट्री ! 
निर्देशक की डायरी १०
पूरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री पिछले १५ साल से गिड़गिड़ा रही है की हम हिंदी फिल्म इंडस्ट्री या भारतीय फिल्म इंडस्ट्री या बम्बई फिल्म इंडस्ट्री कहे जाना पसंद करते हैं. बम्बई फिल्म इंडस्ट्री, कलकत्ता फिल्म इंडस्ट्री, मद्रास फिल्म इंडस्ट्री और लाहौर फिल्म इंडस्ट्री, यही चार पुराने नाम और शहर हैं जहाँ से भारत में सिनेमा बनना शुरू हुआ. बम्बई फिल्म इंडस्ट्री को कब कुछ महामूर्ख पत्रकारों ने बॉलीवुड जैसा नितांत नकलची नाम चिपका दिया, आज अनुसन्धान का विषय है. १९३२ में जब कलकत्ता फिल्म इंडस्ट्री बाकि सबसे ज्यादा और बेहतर सिनेमा प्रोड्यूस कर रही थी तो उसने अपने आप को टॉलीवुड कहना शुरू कर दिया. "The term "Bollywood" has origins in the 1970s, when India overtook America as the world's largest film producer. Credit for the term has been claimed by several different people, including the lyricist, filmmaker and scholar Amit Khanna, and the journalist Bevinda Collaco." 
 इंटरनेट पर उपलब्ध उपरोक्त सूचना ये बता रही है की इस शब्द को दो महानुभाओं एक गीतकार और एक पत्रकार ने प्रमोट किया. गीतकार हों या पत्रकार इनका चरित्र लगभग एक जैसा ही होता है. गीतकार भावों को गुनगुनाते हैं और पत्रकार सूचनाओं को. कुछ चलताऊ विचारों के सिवा इन दोनों तरह के चरित्रों में समानता देखी जा सकती है. इन्हें बिकाऊ सामान बनाना है. इन्हें जल्द जुबान पर चढ़ने वाला अल्फाज़ चाहिए, बिना प्रयत्न भेजे में धसकने वाले विचार चाहिए. ऐसे में बॉलीवुड सुविधाजनक है. भले ही इसके पीछे हॉलीवुड की नक़ल की दरिद्र मानसिकता जाहिर होती है. १९७० में हॉलीवुड से संख्या में ज्यादा फिल्में बना लेने के कारण कुछ लोगों ने ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में इस शब्द का सप्रयास प्रवेश कराया. 
मै फिर से बम्बई फिल्म इंडस्ट्री शब्द को प्रतिष्ठित देखना चाहता हूँ. समूचे भारत में जो सिनेमा बनता है जिसे इंडियन सिनेमा कहा जाना उचित है. बम्बई फिल्म इंडस्ट्री को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री कहने के पीछे साफ़ तर्क ये है कि यहाँ सबसे ज्यादा हिंदी सिनेमा बनता है और दुनिया में वह इसी के लिए ख्यात है लेकिन यहाँ सिर्फ हिंदी सिनेमा ही नहीं बल्कि हिन्दुस्तान की हर भाषा का सिनेमा बनता है. हिन्दुस्तानी इंग्लिश या हिंगलिश भी उन्ही में एक है. ऐसे में इसका ओरिजिनल और पुराना नाम बम्बई फिल्म इंडस्ट्री ही मुझे सबसे ज्यादा आत्मीय लगता है. 
शहरों के बदलते नाम भी मुझे ऐसा अहसास दिलाते हैं जैसे किसी दोस्त ने बोलचाल के चिर परिचित नाम से बुलाये जाने से इंकार कर दिया हो और अब चाहता हो कि उसे स्कूल के नाम से बुलाया जाये.
" अब मै कोलकाता हूँ, मुझे कलकत्ता मत बोल जाहिल !"
"अब मै मुंबई हूँ   ........
अब मै चेन्नई हूँ.....

लेकिन पत्रकार भाइयों ! मेरा नाम हैं बम्बई फिल्म इंडस्ट्री !