शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

फिल्म मेरी विधा है.


फिल्म मेरी विधा है.
निर्देशक की डायरी 5

मुझमें आत्मविश्वास की कमी थी.मै अपने काम पर संदेह करता था. यहाँ  तक कि जिसपर( स्क्रिप्ट पर) सब सहमत और मुग्ध होते थे उस  पर भी मै अकेला संदेहग्रस्त छूट जाता था. लेकिन अब मैंने भी अपने आप को अप्रूव कर दिया है. अब मै जानता हूँ कि मै क्या हूँ , मेरी मुख्य विधा क्या है, मेरे विषय क्या हैं. अब मै अपनी नजर में भी संदेहरहित हूँ.
अब मेरा सिनेमा आकार लेगा और लिखा हुआ वर्क प्रकाशित होगा यानि दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू हो चुका. वर्षों के श्रम से संचित, सिंचित और शोधित 
 विचारों को मैंने खुले हाथ अग्निबीज की तरह बिखरा दिया हैं. मैंने हजारों हमदर्द ढूंढ़ लिया है. मै चाहता तो एक अकादमिक विद्वान की तरह सभी विचारों को पुस्तक, निबंध आदि विधाओं में समेटता गया होता और मेरे नाम से किताबों की संख्या में इजाफा हुआ होता. लेकिन मैंने वही किया जो एक गवांर आदमी करता है ; जो की मै हूँ - मैंने खुरपी को खुरपी और हंसिये को हंसिये की तरह ही प्रयोग किया और विचारों को शोध पत्रिकाओं की जगह सडको, चौराहों, संघर्षशील कलाकारों और आम लोगों के बीच उदारता के साथ बाँट दिया. और हर बांटने में यह मल्टीप्लाई होता गया. 
अब मुझसे मिलते विचारों के बहुत साथी मिल गए, अब मै अकेला नहीं रहा. 
अब अपना सिनेमा बनाऊंगा. 
मैंने तीन लघु फिल्में अभ्यास के तौर पर निर्देशित की हैं और अपने आप को निर्देशक कहने का आत्मविश्वास पाया है. निर्देशक (कलाकार)  छोटा या बड़ा नहीं होता वह या तो होता है या नहीं होता. जैसे की आग या कवि छोटे या बड़े नहीं होते. वे या तो  होते है या नहीं होते. छोटी आग भी हवा का सहयोग पाकर बड़ी आग में बदल सकती है. 
तीन में से एक फिल्म मैंने यू ट्यूब पर शेयर किया है - मदर्स अ शोर्ट स्टोरी .
फिल्म बना लेना मेरे लिए कभी मुश्किल नहीं था; कठिन था निर्देशक बनना. जिसके लिए फ्रेंच टर्म 'औटर' मुझे सर्वाधिक समीचीन लगता है.  ( Auteur Theory that holds that a film's director is its "author" (French, auteur). It originated in France in the 1950s and was promoted by Francois Truffaut and Jean-Luc Godard and the journal Cahiers du Cinéma. The director oversees and "writes" the film's audio and visual scenario and therefore is considered more responsible for its content than the screenwriter. Supporters maintain that the most successful films bear the distinctive imprint of their director. The development of the auteur theory in this article .Starting with the birth of auteur theory in the 1954 Cahiers du Cinima article by Frangoise Truffaut, in which Truffaut attempting to criticize .screen-writers. cinema., in which the creative process essentially ended once the screen-writer finished writing the script. From that point, a director merely put the writing on film without leaving a personal creative imprint on the film. As a result of Truffaut.s article, critics began to put emphasis on auteur theory when writing their reviews. It became necessary for a director to use the film as a way of inventing a personal aesthetic and for each film to demonstrate a step in the overall progression of the director.s creativ) 
औटर' थियरी के पीछे के सिद्धांत संस्कृत काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों के काफी नजदीक हैं . कवि को ब्रह्मा और मनीषी कहना मान्य मत है. कवि ब्रह्मा है, स्वयम्भू है. उसकी जैसी रूचि है वैसा विश्व को  रच डालता है. कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू ...
Auteur theory draws on the work of André Bazin, co-founder of the Cahiers du cinéma, who argued that films should reflect a director's personal vision. Bazin championed filmmakers such as Howard Hawks, Alfred Hitchcock and Jean Renoir. Although Bazin provided a forum for auteurism to flourish, he himself remained wary of its excesses. Another key element of auteur theory comes from Alexandre Astruc's notion of the caméra-stylo or "camera-pen" and the idea that directors should wield their cameras like writers use their pens and that they need not be hindered by traditional storytelling.

फिल्म में ( 'औटर') निर्देशक  ब्रह्मा है. वह संसार को अपनी रूचि के अनुकूल पुनर्सृजित करता है. फिल्म भी अन्य कला विधाओं की तरह एक कलाकार की दृष्टि और दक्षता का ही परिणाम है. फिल्म निर्देशक की विधा है.

फिल्म मेरी विधा है.


बुधवार, 27 जुलाई 2011

प्रेम by Sushil Chaturvedy on Tuesday, July 26, 2011


सुशील  चतुर्वेदी की कविताएँ उनके फेसबुक नोट्स से उठाकर बिना पूछे अपने ब्लॉग पर छाप रहा हूँ. लीजिये आप भी प्रेम को तरोताजा कर लीजिये. 



प्रेम 
सुशील  चतुर्वेदी

प्रेम -१
प्रेम पनपता जाता है
जब प्रेम को पनपना होता है!
प्रेम को पनापने की
आवश्यकता नही होती,
प्रेम के बीज
विद्यमान होते हैं
सदैव, प्रत्येक जगह,
अंकुरित हो जाते हैं
एक और बीज के साथ
जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं
प्रेम के!

प्रेम-२
प्रेम के पुष्प
प्रायः अपने खिलने के संकेत
अपने रूप-रंग से नही
अपनी सुगंध से देते हैं,
प्रायः
वो दिखते भी हैं
और अदृश्य भी रहते हैं!
प्रेम प्रायः गूंगे के गुड़,
ज्योतिषी के ज्ञान
और ज्वालामुखी के लावे सा होता है!

प्रेम-3
प्रेम के डेरे नही होते,
प्रेम
प्रायः अपरिभाषित,अनिर्वाचित
और अननुभूत रह जाता है
क्यूँकि प्रेम अपरूप होता है!
प्रेम,
प्रेम के साथ होता है,
प्रेम के साथ जगता है,
प्रेम के साथ सोता है,
प्रेम के साथ रोता है,
प्रेम के साथ खोता है!

प्रेम-4
प्रेम पलता है
माँ के कोख में संतति की तरह,
प्रेम पलता है
गहरे समुद्र में
सीप में मोती की तरह,
प्रेम पलता है मेरी आँखों में
आँखों की ज्योति की तरह,
और आकार लेता है
होने-ना-होने के बीच
भोर के सपने की तरह!
प्रेम चलता रहता है दिन-रात
नक्षत्रों-ग्रहों की चाल,
प्रेम की ही खोज में!

प्रेम-५
प्रेम गूँजता है
मंदिरों में घंटियों, शंखों और मन्त्रों में,
प्रेम तिरता है
अमृत-सरोवर में शबद के रूप में,
प्रेम प्रायः बन जाता है
मनुहार, मन्नत, आशीर्वाद, दुआ
दिव्यानुभूति, किलकारी, ऊर्जा....!
प्रेम कभी नही बनता
अ-प्रेम,
प्रेम की कोई माया नही,
प्रेम के पास विघटित होने की सामर्थ्य
नही होती!

प्रेम-६
प्रेम
बीतता है
जैसे चन्द्रमा छीजता है,
पर प्रेम रहता है सदैव
इस-पार या उस-पार के जगत में,
प्रेम धूनी की तरह सुलगता है,
चिता की तरह जलता है,
और चटकता है
यज्ञाहुति में हवन-कुण्ड में
पवित्र-अग्नि में लकड़ियों की तरह!
प्रेम की कोई कसौटी नही
पर प्रेम निखरता है, दमकता है
प्रेमाग्नि में तप कर!

प्रेम-७
प्रेम बिखर जाता है
हवाओं में सुगंध की तरह,
मिल जाता है गंगा-जल में
वनौषधि की तरह,
और बहता जाता है तरते-तारते,
प्रेम चमक जाता है
महाश्मशान में दिव्य-प्रकाश की तरह,
और विलीन हो जाता है
क्षितिज में धूम-केतु बन
बादलों के साथ बरसने,
पुनः पनपने के लिए,
प्रेम मर जाता है एक दिन
किसी अमर-पक्षी की तरह!

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

या खुदा ! हिंदी पर रहम कर !

निर्देशक कि डायरी -४ 
घर बर्तन करने वाली लडकियों और किसानी करने वाले लौंडों को आजकल हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर लोग फिल्म पर शोध का काम थमा देते हैं. इस नापाक सिलसिले को रंग देने का गुनाहगार मै हूँ तो ये लोग मुझसे संपर्क करते हैं. ये साहित्य पढने लायक तो है नहीं जो हिंदी में उपलब्ध है, बेचारे सिनेमा पर क्या करेंगे. कुछ ने तो मेरे शोध प्रबंध को शब्दशः कॉपी कर डिग्री भी ले ली. क्या करें यार? अपनी हिंदी का क्या करें?
मुझे तो कोई भी आर्थिक मदद या किसी भी तरह की मदद हिंदी विभाग से नहीं मिली थी. न आज तक आगे काम करने के लिए मिली. मैंने स्वतंन्त्र रूप से सिनेमा को समझने केलिए नोट्स बनाये और किताब में परिवर्तित कर दिया. हिंदी विभाग में जमा किया तो उनलोगों ने एक डिग्री दे दी डॉक्टर की जो मेरी नजर में धेले भर की भी नहीं है. किताब छप कर आई तो मै सफल हुआ. और फिल्म बनाने में लगा हूँ. अपने खर्च से और किताबें तैयार कर रहा हूँ. और ये सुसरे शोध शोध कर के समय ख़राब करते हैं. ये अपने विभाग से कोई ओफिसिअल लेटर भी लेकर नहीं आते. क्या करूँ इनका भाइयों?
मुंबई यूनिवर्सिटी, जे एन यु, देल्ही यूनिवर्सिटी, बी एच यु , इन के हिंदी विभागों में मूर्ख भरे हैं क्या? फिर ये मध्यकाल पर ही केवल शोध क्यों नहीं करवाते या कोई ढंग का रास्ता खोजें जिसमे हमरे जैसे लोगों का समय लेने के अधिकारी बन जाएँ.
सच्चाई ये है कि हिंदी अब हिंदी के प्रकाशकों और हिंदी के विभागों से बहार विकसित होगी. आईटी सेक्टर से मै गंभीरता कि उम्मीद कर रहा हूँ. किसी भी विषय में और सिनेमा में तो आजतक एक तकनिकी किताब नहीं मिलेगी हिंदी में. 
राष्ट्रवाणी तो थी ही हिंदी, राष्ट्रभाषा बनने के कुछ ही दिनों बाद राजनीतिक गलियारों में  साहित्य के दलालों के हाथ का खिलौना बन गयी .

मेरी पुस्तक भारतीय सिने-सिद्धांत को हजारों लोगों ने पढ़ा और लाभ उठाया है. उसे लिखने में मुझे सात साल लगे और प्रकाशित होने में तीन साल, उसके बाद सात साल और गुजर चुके हैं और मंशा रहते हुये भी मै भी दूसरी किताब नहीं दे सका.

या खुदा ! हिंदी पर रहम कर !





रविवार, 24 जुलाई 2011

किसी साल बारिश में लिखे गए दो गीत..

 बारिश में



आ रहे है खेलकर फुटबॉल बारिश मेंबादलों की उड़ रही गुलाल बारिश में .
दिल के तट को छू रही तेरी दुआएं है
तेरे रंग की ओढ़ ली रुमाल बारिश में .

गरजते  है तब बहुत कठोर लगते हैं
बरसते है तो बजे हैं ताल बारिश में .

ये मिलन धरती गगन का गजब है, यारो !
हम भी भीगेंगे इस साल बारिश में .



पाओस आल ..


जाल खोलते हैं मछुआरे
 पाल खोलते हैं मछुआरे
पहली मछली की तड़पन से साल खोलते है मछुआरे !

बीज ढो रहे हैं बनिहारे
बीज बो रहे है बनिहारे
इस मौसम में किस मौसम के बीज हो रहे हैं बनिहारे ?

घास गढ़ रहे हैं घसियारे
घास पढ़ रहे हैं घसियारे
बरसा से सरसी धरती कि साँस पढ़ रहे है घसियारे .....

पाल खोलते हैं मछुआरे .

बुधवार, 20 जुलाई 2011

उगने लगे शब्द/ From - जलतरंगों की आत्मकथा, published by kitabghar

उगने लगे शब्द 

अनुपम 
(बरसात में मै रामांटिक हो जाता हूँ. बहुत सुंदर कवितायेँ याद आती हैं . मेरे पहले और अबतक प्रकाशित एक मात्र संग्रह जलतरंगों की आत्मकथा की एक अति रोमांटिक कविता पब्लिश कर रहा हूँ. संग्रह १९९२ में किताब घर ने प्रकाशित किया था और ये कविता १९८८ में लिखी गई थी जब मैं जब मै महज १८ साल का था और मेरी तुलना एक कवि चित्रकार ने किट्स से की थी. एक नए कवि के लिए यह तो पुरष्कार जैसा था. लीजिये आप भी पढ़िए. )
मेरी अँगुलियों से लिपट गया है एक शब्द अंगूठी सा 
कहीं ये तुम्हारा नाम तो नहीं 
मेरे स्वर में बार बार गुनगुना रही है मुझे एक धुन 
कहीं ये तुम्हारी हँसी तो नहीं 
मैंने नहीं सुनी है तुम्हारी हँसी
नहीं जनता हूँ नाम 
तुम्हे देखते ही मेरी आँखों में उगने लगे शब्द 
झरने लगे शब्द 
तुम्हारे आसपास रंगीन बुलबुलों से बिखरने लगे शब्द
तुम्हारी अलकों में, माथे पर 
संवारने लगे शब्द 
मेरे शब्द ;
 
और शब्दों के घेराव में तुम्हारा रूप 
भोर के होठो से चुराई  गई 
अंजुरी भर धूप
तुम्हारा रूप कविता सा लगा 

तुम्हारी आँखें मेरे चुराए उन क्षणों सी 
जिनमें मेरे गीतों ने तुम्हारे होठों को
हाँ, तुम्हे ही तो पुकारा था
लौट गए थे तुम अनसुने 

दूर तक गूंजती रही तुम्हारी पदचाप 
दिक् कन्याओं की अलकों से झरी चांदनी उदास 
और मैं आकाश गंगा में एक नामहीन तारे सा गुम गया
तब भी
हाँ, तब भी मेरी कलम की नोक से झरे थे नीले फूल !

तबे मेरा कवि मन 
छली मन 
शब्दों की तरह बिखरा है रंगमंच पर एक सूनी प्रतीक्षा में 
शायद तुम - 

तुम उन्हें अपने पाँवों में पिरो लो !