गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

नया सिनेमा और ....नया क्या है ? का सवाल



1968 में एक विचारधारा को लेकर बीस, पचास बौद्धिक उठ खड़े होते हैं और एक नई  धारा फूट पड़ती है और कुछ ही समय बाद एक अकेला आदमी रास्ता बनाता आगे बढ़ता दीखता है। कहाँ गए सब ? और यह अकेला महारथी श्याम बेनेगल है।
 एक फिल्म के कला फिल्मकार आते हैं, एक या दो फिल्म बना कर परम कन्फ्यूज होते जाते हैं। कुछ सफल कुछ अर्ध विफल और कुछ असफल होते हैं। जनवादी विचारधारा को आधार में रख कर 1940 में शुरू हुआ इटली का न्यू वेला सिनेमा हिंदी में 1968 में गमले में उगाया जाता है। इसकी कलम मृणाल सेन लेकर आये क्योंकि कला सिनेमा बंगाल में 1952 से ही फल फुल रहा था।
 अब तो नया सिनेमा की बात करना ओल्ड फैशंड हो गया है।
आज के कई फ़िल्मकार उत्तर कला सिनेमा की कड़ियाँ हैं। जब इनका मजबूत समय आया तो ये सितारों की तरफ देखने लगे और स्क्रिप्ट इनकी पहली पसंद नहीं रह गई।
ये चाहें तो नया सिनेमा के लिए एक शक्तिशाली आधार बना सकते हैं। अपनी मूलभूत सोच की धारा को, जो की इनकी आरंभिक फिल्मों में दिखाई देती है, ये बहुत प्रभावशाली बना सकते हैं।
सेंसर्ड होने के बाद हर फिल्म कमर्शियल होती है। गोविन्द निहलानी
सिनेमा व्यवसाय है लेकिन सिर्फ व्यवसाय नहीं - दयाल निहलानी
आज के सिनेमा को देख कर मै  25 साल का युवा होना चाहूँगा, आज हर तरह की फिल्मों का माहौल है। श्याम बेनेगल
फ़ोकट में सिनेमा देखनेवालों के लिए मै फिल्म नहीं बनाऊंगा। प्रकाश झा

इन सभी फिल्मकारों के विचारों को  एक सूत्र में बांध कर इस पर दादा साहेब फालके की एक टिपण्णी रखता हूँ - "सिनेमा मनोरंजन तो करता ही है, साथ साथ ज्ञान वर्धन भी कर सकता है।"
इस विचार के आईने में एक बार विचारवान फिल्म कर्मियों को एकजुट होना चाहिए।
आमीन -
डॉ। अनुपम

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

पढ़े लिखे लोग फिल्म इंडस्ट्री में आयें .


 ( पढ़े लिखे लोग फिल्म इंडस्ट्री में आयें -धुंडीराज गोविन्द फालके, १९२०, नवयुग पत्रिका, मराठी,बीसवीं सदी के भरत मुनि के नाम से नवाजे गए भारतीय सिनेमा के पितामह ने इसी शीर्षक से एक आलेख लिखा था.)


मैं पच्चीस साल की उम्र से फोर्टी प्लस एक्टर्स के लिए स्क्रिप्ट्स लिख रहा हूँ लेकिन जब उनके पास स्क्रिप्टें लेकर गया तो पता चला कि वे सब के सब पच्चीस साल के जवानों का रोल करना चाहते हैं.  हमारी फिल्म इंडस्ट्री के एक्टर मच्योर नहीं होना चाहते, वे किशोर बने रहना चाहते हैं. ऐसे में अगर सिनेमा भी लौंडे पने से बाहर नहीं निकल पा रहा है तो हैरानी की कोई बात नहीं.
इस निरर्थक मनोरंजन से अलग एक गंभीर सिनेमा कि जरुरत है. अब देखिये, हमारे यहाँ सिर्फ सोलह से २७ के बीच की उम्र के लोगों के लिए सिनेमा बनता है. बच्चो और बड़ों के लिए हमारा सिनेमा उद्योग  फेल है.  एक बड़ा कंज्यूमर है जिसके लिए हिंदी सिनेमा उद्योग में प्रोडक्ट नहीं बनता है . एक काफी बड़ा दर्शक वर्ग है जिसे सिनेमा हॉल तक खीच लाने की क्षमता हमारे फिल्मकारों में नहीं है. इक्का दुक्का अपवादों की बात छोडिये, मॉस प्रोडक्शन की बात करिए.
हिंदी में १९६८-७० में इसी तरह की सोच को कला सिनेमा के रूप में आकार मिला था.  फिलहाल बहुत तरह का सिनेमा बने तभी हम इस उद्योग पर अपनी पकड़ बनाये रख सकेंगे. व्यावसायिक संघर्ष अब विश्व स्तर पर है. हिंदी सिनेमा को अब सबसे ज्यादा खतरा अंग्रेजी के विविध रंगी और मच्योर सिनेमा से है.
हिंदीतर भाषाओं की फिल्में जो लोग देख पाते हैं वे मच्योर सिनेमा का मतलब बखूबी समझ सकते हैं.
तो अब मैं अपनी कुछ फिल्मों में एक्टिंग भी कर रहा हूँ.
बनारस में दस साल तक एक कवि का सम्मानजनक जीवन जीते हुए मैं प्रसिद्धि और चमक के अच्छे -बुरे असर को जानता हूँ. आदमी रुक जाता है. एक रूप में बंध जाता है. उस से बाहर नहीं निकलना चाहता. उसकी इमेज ही उसकी खोल और कब्र बन जाती है. इक्कीस साल की उम्र में हर तरफ अपने लिए आँखों में चमक देखना किसी को भी घमंडी बना देने के लिए काफी हैं. मेरी कवितायेँ लोगों की जुबान पर थीं. एक समय ऐसा भी आया कि मैं चौबीस घंटे कविआया हुआ रहने लगा. फिर मैंने काफी धक्के खाने के बाद कविता लिखना जारी रखते हुए, कवि दिखना, बनना छोड़ दिया. दरअसल सितारा बनते ही इन्सान की अक्ल फूल जाती है. यहाँ जो सम्हल गया वो बच गया.
जमीन पर खड़ा एक सहज , सामान्य आदमी बने रहना ही असली कलाकारी है.
दादा साहेब फाल्के ने १९२० में आह्वान किया था - "पढ़े लिखे लोग फिल्म इंडस्ट्री में आयें." आज उसको दोहराने की जरुरत है.
किसी भी उम्र का  एक पढ़ा लिखा , अनुभवी और तैयार इंसान ही फिल्म में अभिनय करने योग्य होता है. नाटक और फिल्म के अभिनेता में अंतर होता है. नाटक में अभिनेता चाहिए फिल्म में कास्ट. फिल्म में एक तैयार पर्सनालिटी की जरुरत होती है जिसे अभिनय भी आता हो. इस फर्क को ध्यान में रखते हुए मैं आह्वान करता हूँ कि पढ़े लिखे लोग फिल्म इंडस्ट्री में आयें. विकसित मनुष्य ही फिल्म में अच्छा अभिनय कर सकता है.
मेरा फ़िलहाल ऐसा ही सोचना है.
 डॉ. अनुपम
(निर्देशक की डायरी, २६)

बुधवार, 5 सितंबर 2012

भेड़िये मेमनों को पालते हैं ?


गाँव के भेड़िये गाँव में तुम्हें  नहीं रहने देंगे
शहर के जानवर महानगरों के भेड़ियों के आगे तुम्हे डाल देंगे
मेमनों को फुसलाये रखने के लिए भेड़िये
मेमने को आगे कर देते हैं,
घर से,गाँव से, राज्य से, देश से,
वे तुम्हे हर जगह से निकाल लेंगे -
वे तुम्हे थाल में सजना सिखायेंगे
उकसायेंगे,
तुम बेतहाशा भागोगे महानगरों की तरफ
वे धीरे से हाथ बढ़ाएंगे तुम्हारे गाँव की तरफ.

तुम्हारी जमीनें उनका फार्महाउस बनेंगी
तुम्हारे घर उनके गोदाम,

अगर तुम मेमने हो तो तुम्हारी यही गति है

क्योंकि अन्दर ही अन्दर
इस सरजमीं पर पूरा भेड़िया राज है
छछूंदर के सर पर ताज है.

अनुपम , ६-०९-१२

रविवार, 8 जुलाई 2012

MAINE LAAKHON KE BOL SAHE (DADRA): 1.


वर्तमान समय और आलोचना 

साहित्य हो या सिनेमा इस वक़्त किसी की आलोचना करना ठीक नहीं माना जा रहा है. वस्तुतः इस वक़्त हर कला और हर कलाकार बाजार में खड़ा है. आपकी वस्तुगत आलोचना उसका बाजार बिगाड़ सकती है.  इसका असर साहित्य और सिनेमा के हक़ में नहीं है. आलोचना रचनाकार को और बेहतर लिखने या रचने के लिए प्रेरित करती है. लेकिन आलोचना को लेखक और निर्देशक बहुत व्यक्तिगत स्तर पर ले रहे हैं. प्रतिउत्तर देने की जगह प्रतिक्रिया कर रहे हैं. ऐसे में दुष्यंत कुमार का यह शेर सामयिक हो जाता है -
मत कहो आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है. 
 इस लिए सिर्फ शुभ शुभ बोलें. 
हालाँकि आलोचना का उद्देश्य रचना को और सुन्दर, सार्थक बनाना ही होता है. 
सबका शुभ हो. 
अनुपम 

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

कला का वर्तमान समय और काशी का अस्सी 

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर देखने और उसकी भाषा ( फिल्म भाषा नहीं, संवादों की भाषा क्योंकि फिल्म भाषा पर हमारे फ़िल्मकार सोच लेते हों तो वही काफी है, पत्रकार और प्रतिक्रियाकार तो बिलकुल नहीं सोचते .) की भारी आलोचना सुनने के बाद मैंने फिर से काशी का अस्सी पढ़ा. एक पाठकीय नजरिये से देखने पर  इस उपन्यास में वर्तमान समय को जिस मजबूती से पकड़ा गया है, वह आश्चर्यजनक है. मैं अभिभूत हो गया. यह अपने समय का एक अनूठा दस्तावेज है. 
 मैंने अपने आठ वर्ष  डॉ. काशीनाथ सिंह के सानिध्य में बिताये हैं. आलोचना और सीधे सच बोलना भी इनसे सीखा है. डॉ. काशीनाथ सिंह एक साइलेंट लेखक हैं और बेहद -बेहद अच्छे गुरु.
चाणक्य सीरियल और पिंजर फिल्म से अपनी गुरुता को जगत विख्यात कर चुके डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी की इसी उपन्यास पर आधारित फिल्म मोहल्ला अस्सी  का इन्तजार है. चंद्रप्रकाश द्विवेदी एक जीनियस डाइरेक्टर और साथ ही अपनी फिल्मों को लेट करने के लिए भी जगत विख्यात हैं.
 ये फिल्म कब आएगी भाई ? कोई तो बताये...?

अनुपम 
6-07-2012

गुरुवार, 5 जुलाई 2012


विकास के नाम पर 


भवनों के बीच
 उग आते पहाड़ों ने 
कविताओं का नुकसान किया है. 

मेरी खिडकियों के बाहर की हरी जमीन
मेरा चित्रपट
जहाँ देखी सफ़ेद बगुलों की पाँत, मेला, बारात ;
जबसे वह  खुला उद्यान 
भवन के नाम कुर्बान होना शुरू हुआ है 
मेरी कविताओं का 
बड़ा नुकसान हुआ है. 

सच तो ये है कि आज कल साहित्य के नाम पर
ब्लोग्ग पर, वाल पर 
कूड़ा लिख रहा हूँ. 

पुरानी कविताओं में अर्थ ढूंढ़ रहा हूँ.

 मेरी खिड़की के बाहर 
एक चौदह मंजिली इमारत उग आई है,
जिसने छीन लिया है 
हमारा खिड़की भर आसमान

और बिना आसमान के 
कहाँ लिखूं  मैं कवितायेँ ?

अनुपम