शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

मूर्ख-भक्षक की पीड़ा


 
डॉ. अनुपम 

बहुत तकलीफ हो गई है. सूचना क्रांति ने मेरा जीना मुश्किल कर दिया है. मुझे कई कई दिन भूखा रहना पड़ता है. मुझे मूर्ख नहीं मिलते. मूर्ख सूचनाओं के पीछे छुप जाते हैं. वे शेरो, शाइरी, राजनितिक खबरें, फिल्म, साहित्य से लैस हो कर निकलते हैं . मै जबतक समझूँ की ये मूर्ख है, तबतक वह मुझे मूर्ख भक्षक जानकर सूचना के जंगल में भाग छुपा होता है. सामान्यतया हर मूर्ख अपने आप को ढंकना जानता है. 
मुझे भूखा रहना पड़ रहा है. दिखें तो सूचना दीजियेगा...

बुधवार, 18 जनवरी 2012

मित्र मंडली से मशवरा -



बहुत सुंदर रचना है तो मै इसे अपने मित्रों को कहाँ सुनाऊं, ब्लॉग या फेसबुक से बेहतर क्या होगा..

डॉ. अनुपम 
..
हर सम्बन्ध का स्थाई भाव है मैत्री. मैत्री में निर्भयता है निर्भरता नहीं. प्रेम है 'ब्योपार' नहीं इसलिए गंभीरता से मै कुछ मशवरा करना चाहता हूँ. मुझे कुछ लेखकों ने चेताया की वे अपनी रचनाएँ प्रकाशन के लिए भेजने के बाद ही कभी कभार फेसबुक पर पोस्ट करते हैं. यानि फेसबुक को वे एक सोशल नेट्वोर्किंग मीडिया न मानकर एक फीलर या प्रचार माध्यम मानते हैं. वे चोरी के विषय में भी चेता रहे थे. हिंदी के लेखक तकनिकी विषयों में अरुचि के भी शिकार होते हैं .
लेकिन मैंने फेसबुक और ब्लॉगिंग को बहुत गंभीर माध्यम के रूप में अपनाया है. मै अपने परिहास में भी स्तरीय हूँ. अक्सर चोरों को ही चोरी के विरुद्ध बोलते सुना है. जानकारी के लिए बता दूँ कि  फेसबुक या ब्लॉग पर आपकी रचना प्रकाशित होते ही वह स्वतः उस तारीख और समय में दर्ज हो जाती है, रजिस्टर्ड हो जाती है. 
कवितायें, रचनाएँ या विचारों को खुलकर शेयर करिए . दूर, सुदूर संवाद, सहयोग, सम्बन्ध और ब्यापार के इस महा वरदान का जमकर लाभ उठाइए.
किताब छपे, पत्रिकाओं में कवितायें छापें, अखबारों में साहित्य को जगह मिले और ब्लॉग , टीवी , फेसबुक पर भी गंभीर साहित्य छपे, गोष्ठियां हो, सेमीनार हो.
 'ब्योपरियों' ने भी रंगदार चोले पहन लिए हैं तो क्या कहते हैं आप? 

 




एक ताज़ा रचना


एक ताज़ा रचना 
                                                अनुपम 
नटवर तेरी गैया 
खा गई मेरा गल्ला .

आधा ले गया लल्ला 
बाकी ले गया दल्ला 
जो कुछ बचा खुचा था 
सो कुछ यहीं रखा था .

उसमे कुछ उसका था
उसमे कुछ अपना था 
अपनेमे सपना था 
सपने में था सैंया .

कबसे ही उखड़ा है
 दरवाजे का पल्ला 
एक नहीं कपड़ा है 
सात बरस का लल्ला,

सुनलो जसुमति मैया 
सुन लो नटवर लल्ला 
सब खा गई तेरी गैया 
क्या खाए मेरा लल्ला .

नटवर तेरी गैया 
खा गई मेरा गल्ला .
.......................................
एक ताज़ा विचार - अगर आपको लगे कि आप किसी को प्रेम कर रहे हैं या आपको कोई प्रेम कर रहा है तो पूछ लीजिये, कह लीजिये. अगर हाँ तो हाँ, न तो ना . मित्रता बची रहेगी. यही स्वाभाविक है भावो को स्पष्ट कर लेना. भावों को दबा देना ठीक नहीं. शुभ दिन.

बुधवार, 11 जनवरी 2012

प्रेम का मार्ग .. घनानंद



मै घनानंद से सहमत हूँ. प्रेम में चालाकी नहीं चलती. यानि चालाक लोग और चाहे जो करते हों, उन्हें प्रेम का स्वाद नहीं मिलता है.
 -
तहं साँची चले तजि आपुन पौ 
झाझके कपटी जे निसांक नहीं.

प्रेम के पथ में सिर्फ सच्चे लोग ही अपने अहं का त्याग कर चल पाते हैं. वह कपटी, धूर्त झिझकता है जिसका मन साफ़ नहीं होता.


अति सूधो सनेह को मारग है
जहाँ नैकु सयानप बांक नहीं.
तहं साँची चले तजि आपुन पौ
झाझके कपटी जे निसांक नहीं.
तुम कौन सी पाटी पढ़े हो लला
मन लेहु पै देहूं छटांक नहीं.
घन आनंद प्यारे सुजान सुनो
इत एक से दूसरो बांक नहीं.

अति सूधो सनेह को मारग है,  स्नेह का मार्ग सीधा है.
 घनानंद कहते हैं कि अत्यधिक चतुराई, चालाकी स्नेह को मार देती है. यहाँ तनिक भी सयानेपन कि नहीं चलती. सुजान, तुम प्रेम के किस स्कूल में पढ़ी हो कि मेरा मन ले लिया या मनो मन, सारा मन ले लिया और एक छटांक भी वापस नहीं करती हो. मेरी प्यारी सुजान सुनो, यहाँ, मेरे दिल में एक तुम्हारे सिवा किसी के लिए जगह नहीं है. 

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

अबोला न समझना..


अबोला न समझना..

सुनो मेरे प्यार !
अपने हर अनुभव को मै अल्फाज नहीं दूंगा .

मै तुम्हारे पास बैठूँगा और ये
कायनात हमारी होगी
बिना कहे भी तो सारे अर्थ अभिभूत कर जाते हैं
शब्दों का साधक मै
मेरा वादा है कि मै अपने सभी अनुभवों को शब्द
नहीं दूंगा क्योंकि
जब भी हमारे बीच शब्द आते हैं:
सिर्फ शब्द रह जाते हैं,
हम नहीं .

 हर पल
मुझे तुम्हारी पूरी मौजूदगी चाहिए
इसीलिए....

अनुपम
( 10-1-2012,Bombay,)

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

आइये कविता के उद्देश्य पर गंभीर हुआ जाए


अगर सच की रखवाली नहीं करनी हो तो मै कविता क्यों लिखूंगा? मै तो सच ही लिखूंगा. इतिहास गवाह है कि कविता में सच ही बचता है.
डॉ. अनुपम 

मांग के खईबो, मसीत में सोइबो 
काहू की बेटी से बेटा न ब्याहन.....
                    ( 'कवितावली'  )  
"मांग कर खाऊंगा, मस्जिद में सो लूँगा, किसी ब्रह्मण की बेटी से मुझे अपने बेटे की शादी नहीं करनी है, इसलिए जो लिखता हूँ, जिस भाषा में लिखता हूँ, वही और वैसे ही लिखूंगा. मै इन ब्राह्मणों ( ब्रह्म को जानने का दावा करने वालों , खेमेबाज विद्वानों ) के बताये रास्ते पर नहीं चलूँगा."?
तुलसीदास ने किस मनोदशा में ये बातें लिखी हैं ?
तुलसीदास की इस मनोदशा पर विचार किया जाये. ( इस पद को प्रकाशित करने के लिए मै कवितावली खोज रहा हूँ. किसी और मिल जाये तो प्रकाशित करें.)
आइये कविता के उद्देश्य पर गंभीर हुआ जाए.

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

शोषक भैया

अज्ञेय की एक कविता

शोषक भैया

शोषक भैया !
पी लो
मेरा रक्त मीठा है,
 ताज़ा है,
सुहृद है

 पी लो शोषक भैया

मै कुछ न कहूँगा
पी लो,
लेकिन तुम अपना मेदा देखो

क्योंकि उसका क्या करोगे
कि तुम्हारा और मेरा जो सम्बन्ध है
वही तुम्हारा काल है.