शून्य में से शून्य निकालो तो शून्य बचता है, शून्य में शून्य डालो तो शून्य बचता है ... तो क्या चोरी या सीनाजोरी ? चुराने दीजिये चुराने वालों को. लेखन, सिनेमा, चित्र या कलाकर्म का आधारभूत उद्देश्य अपने और दूसरे की संवेदनाओं का विकास है. लिखना और सुनना और गुनना चलते रहना चाहिए! महत्वाकांक्षी लोग ही चोरी करते हैं, महत के आकांक्षी आगे बढ़ते हैं.
एक और सृजनात्मक दिन के लिए शुभकामनाएं !
रविवार, 17 अक्टूबर 2010
सोमवार, 11 अक्टूबर 2010
लिखने भर की रोशनी..
पहाड़ की तलहटी में
सागर किनारे
हमारे तलवों तले गर्म थी रेत
कि
फूट पड़ा एक झरना
हमें सराबोर करता
सागर में मिल गया
तुम्हे इतना जान गया हूँ कि
जानने का गुमान नहीं रहा
फ़िर भी बची हुई है गहराई तुम्हारे होने की
(तुम्हारे रूप में एक अरूप है;)
जो सागर और नदी
फूल और बारिश
आग और चन्दन सब है.
एक "हूँ" में हम हरसिंगार की तरह
खिलते हैं
एक छोटी छुअन में भी
नमक-पानी की तरह घुलते हैं,
(हल्दी-नमक में गलते अचार में
घरपन की खूशबू है.)
तुमने मुझे लिया
अपनी हजार शाखों
अनन्त टहनियों में फूलों की तरह.
वनतुलसी की खूशबू में
आदिम पवित्रता की भावना है,
वन है और तन है!
चौराहे के स्ट्रीट लैम्प की तरह
तुम्हार चेहरा उगा हि रहता है
चौबीसों घन्टे, बारहो मास.
मुझे लिखने भर की रोशनी चाहिये....
सागर किनारे
हमारे तलवों तले गर्म थी रेत
कि
फूट पड़ा एक झरना
हमें सराबोर करता
सागर में मिल गया
तुम्हे इतना जान गया हूँ कि
जानने का गुमान नहीं रहा
फ़िर भी बची हुई है गहराई तुम्हारे होने की
(तुम्हारे रूप में एक अरूप है;)
जो सागर और नदी
फूल और बारिश
आग और चन्दन सब है.
एक "हूँ" में हम हरसिंगार की तरह
खिलते हैं
एक छोटी छुअन में भी
नमक-पानी की तरह घुलते हैं,
(हल्दी-नमक में गलते अचार में
घरपन की खूशबू है.)
तुमने मुझे लिया
अपनी हजार शाखों
अनन्त टहनियों में फूलों की तरह.
वनतुलसी की खूशबू में
आदिम पवित्रता की भावना है,
वन है और तन है!
चौराहे के स्ट्रीट लैम्प की तरह
तुम्हार चेहरा उगा हि रहता है
चौबीसों घन्टे, बारहो मास.
मुझे लिखने भर की रोशनी चाहिये....
मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010
सपनों को गर्माहट देने में मददगार है बम्बई .
सपनों को गर्माहट देने में मददगार है बम्बई ...
जब सारा नगर सो गया था
मै अँधेरे से आँखें मिलाये जाग रहा था
अँधेरा मेरे कमरे में उजाला उलीच रहा था
सोये हुये नगर में मेरा कमरा रेल की भट्ठी बना हुआ था
जैसे की दुनिया के और भी नगरों में कवियों की आँखें
जागती आँखें
नींद की प्रहरी बनी होंगी ;
मै जाग रहा था
और जाग रही थी बम्बई .
करोडो-करोड़ लोगों को रोजी देने वाली ओ बम्बई !
तुम्हारी अभ्यर्थना में मैं चारण - कवि हो जाना चाहता हूँ!
क्यों नहीं ये पूरा देश तुम्हारी तरह कर्मशील हो जाता ?
क्यों नहीं तुम लोकल रेलवे लाइनों का जाल फैलाकर पूरे देश में फ़ैल जाती हो ?
मेरे सवाल पर मुस्कुराकर सर हिलाती है
कल की तैयारी करती बम्बई ...
जब सारा नगर सो गया था
मै अँधेरे से आँखें मिलाये जाग रहा था
अँधेरा मेरे कमरे में उजाला उलीच रहा था
सोये हुये नगर में मेरा कमरा रेल की भट्ठी बना हुआ था
जैसे की दुनिया के और भी नगरों में कवियों की आँखें
जागती आँखें
नींद की प्रहरी बनी होंगी ;
मै जाग रहा था
और जाग रही थी बम्बई .
करोडो-करोड़ लोगों को रोजी देने वाली ओ बम्बई !
तुम्हारी अभ्यर्थना में मैं चारण - कवि हो जाना चाहता हूँ!
क्यों नहीं ये पूरा देश तुम्हारी तरह कर्मशील हो जाता ?
क्यों नहीं तुम लोकल रेलवे लाइनों का जाल फैलाकर पूरे देश में फ़ैल जाती हो ?
मेरे सवाल पर मुस्कुराकर सर हिलाती है
कल की तैयारी करती बम्बई ...
शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
vichar
हमारा सामूहिक मन व्यक्ति पूजा को पसंद करता है. महात्मा गांधी उस मन के बहुत अनुकूल है. आज लालबहादुर शास्त्री का भी जन्म दिन है जिन्होंने कोई विशेष वेश-भूषा नहीं अपनाया लेकिन अपना काम किया. उनको भी नमन जिन्हें प्रचार तंत्र ने देव छवि नहीं बना दिया.
मंगलवार, 28 सितंबर 2010
vichar
फेसबुक से मुझे पता चला की मेरी पुस्तक भारतीय सिने-सिद्धांत को हजारों लोगों ने पढ़ा और लाभ उठाया है. उसे लिखने में मुझे सात साल लगे और प्रकाशित होने में तीन साल, उसके बाद सात साल और गुजर चुके हैं और मंशा रहते हुये भी मै दूसरी किताब नहीं दे सका. सारा वक्त रोजी रोटी में चला जा रहा है. मेरी जरूरतें बहुत कम हैं जो किसी वजीफा से भी पूरी हो सकती है.फ़िलहाल अगर कहीं पढ़ाने का काम भी मिले तो मैं हिंदी की जोरदार सेवा कर पाउँगा. उम्र निकली जा रही है.किसी बड़े दल या कद की छाया भी नहीं है.टीवी, सिनेमा के काम में समय और मन अपना नहीं रहता. दोस्तो, बंधुजनों, आदरणीयों! क्या करूँ?
बुधवार, 22 सितंबर 2010
Bol - Vachan / बोल - वचन
अच्छा साहित्य भाषा को समृद्ध करता है और अच्छा इन्सान समाज को समृद्ध करता है लेकिन साहित्यकार, फ़िल्मकार या कलाकार अच्छे इन्सान भी हों तो मानवता को समृद्ध करते हैं!
शनिवार, 18 सितंबर 2010
film
अपनी प्राचीनता में या पारंपरिक कलाओं से अपने सम्बन्ध में फिल्म एक राग की तरह है और नवीनता ये है कि हर फिल्म की स्वर प्रणाली नई और भिन्न होती है .फिल्म एक राग की तरह है लेकिन हमेशा या हर बार इसका अविष्कार करना पड़ता है .
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