शनिवार, 14 अगस्त 2010

आजादी

आजादी
क्या उन तीन थके रंगों का नाम है
जिसे एक पहिया ढोता है
या इसका कुछ और मतलब होता है !
सुदामा पाण्डेय धूमिल (संभवतः १९६० की रचना  )

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

यक्ष - प्रश्न ...१.

यक्ष - प्रश्न ...१.
ईश्वर ! तू  सामंती सोच का अवतार है ?
शोषण का तरफदार है ?
आखिर तुम में करुणा क्यों नहीं हैं ?
या तो गरीबी की औलाद है
शोषित है , बेजुबान है ?

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

कविता पर बहस शुरू करो

क्योंकि कविता अब उतनी ही देर सुरक्षित है
जितनी देर कसाई के ठीहे और गंड़ासे  के बीच
बोटी ,
 इसलिए कविता पर बहस शुरू करो और
 शहर को अपनी तरफ घुमा लो!
                                   सुदामा पाण्डेय धूमिल

बुधवार, 11 अगस्त 2010

बोल -बचन ; सन्दर्भ - हिंदी साहित्य.....जीवन भर नामवर जी ने लिखा कम और बोला अधिक है. मेरी सलाह है किअब उनसे बोलने के लिए न कहा जाये. उनसे लिखने का आग्रह किया जाये . उनका लिखा हुआ हर शब्द साहित्य की निधि है . उनके एक शब्द की तुलना एक ग्राम युरेनियम से किया जाये तो भी कमतर होगा .

बोल -बचन ;  सन्दर्भ - हिंदी साहित्य
विभूति-छिनाल प्रकरण पर मोहल्ला लाइव पर मैंने विष्णु खरे का आलेख पढ़ा -लेखक होने के वहम ने इस कुलपति की सनक बढ़ा दी है .लगे हाथ उनका दूसरा आलेख भी पढ़ डाला - इन्‍हें कैसे मिल गया भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार. तीसरी तरफ तेजस्वी पत्रकार अविनाश दास ने मुहीम चला रखा है -शर्मनाक है कि नामवर सिंह इस मसले पर चुप हैं!
इन तीनों मुद्दों को अगर एक ही सन्दर्भ में देखा जाये तो ये हिंदी साहित्य से सम्बंधित हैं . गौर करने पर  हिदी साहित्य की वर्तमान स्थिति दिन के उजाले की तरह स्पष्ट हो जाती है . हिंदी साहित्य पिछड़ों  का पक्षधर साहित्य होने की जगह पिछड़ा साहित्य हो गया है.
नामवर  जी हिंदी साहित्य के अग्रणी नेता हैं और वे इस मुद्दे पर चुप हैं. पत्रकार उनको खोदे जा रहे हैं है लेकिन सन्तप्रवर की चुप्पी नहीं टूट रही है.  विभूति जैसे सामंती मिजाज के आदमी की  साहित्य में इतनी दमदार पैठ नामवर जी के सहयोग के बिना मिल ही नहीं सकती.प्रतिभाहीन लोग प्रतिभाशाली लोगो के सहयोग के बिना खड़े ही नहीं रह सकते . दूसरी तरफ भारत भूषण अग्रवाल पुरष्कार से तमाम कच्चे कवियों, अकवियों को बिगाड़ने के पीछे भी उनकी बराबर भूमिका रही है . 
 अगर एक वाक्य में कहा जाये तो नामवर जी उस किसान की तरह किं-कर्तब्य -विमूढ़ से खड़े है जिसके सामने उसकी बोई हुई फसल लहलहा रही है . ज्ञानचतुर्वेदी ने हाल ही में कहीं लिखा है की नए लेखकों की फसल कहीं खर-पतवार तो नहीं?
 जी हाँ! बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ से होए .
जीवन भर नामवर जी ने लिखा कम और बोला अधिक है. मेरी सलाह है किअब उनसे बोलने के लिए न कहा जाये. उनसे लिखने का आग्रह किया जाये . उनका लिखा हुआ हर शब्द साहित्य की निधि है . उनके एक शब्द की तुलना एक ग्राम युरेनियम से किया जाये तो भी कमतर होगा . 
वैसे भी बोल बचन की मठाधिसी का समय ख़त्म हो चूका है .

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

vichar

 हर लेखक के जीवन में एक दिन आता है जब वह खुद अपने को पहचान पाता है ,जब उसे अपना मुख्य विषय मिल जाता है .इस विषय के साथ उसे बाद में गद्दारी नहीं करनी चाहिए. सच्चा लेखक  अपने ह्रदय का आदेश मानते हुये विश्व मत का विरोध करने से कभी नहीं झिझकता. रसूल हमजातोव

रविवार, 8 अगस्त 2010

छिनाल या छिनार का अर्थ होता है कुलटा, बदकार,पुंश्चली,व्यभिचारी.यह एक स्त्रीलिंग शब्द है जो छिः नार अर्थात स्त्री को पुरुषों के बनाये नियमों का उल्लंघन करने पर उसे तिरस्कृत करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, है

छिनाल या छिनार का अर्थ होता है कुलटा, बदकार,पुंश्चली,व्यभिचारी.यह एक स्त्रीलिंग शब्द है जो छिः नार अर्थात स्त्री को पुरुषों के बनाये नियमों का उल्लंघन  करने पर उसे तिरस्कृत करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, है  . यह अत्यंत प्रभावकारी है और क्षण मात्र में स्त्रियों को अपमानित करने में सर्वथा समर्थ है.
यह शब्द पुरुषों की खीज से प्रसवित हुआ है. यह दिमाग की खाज का बायोप्रोद्क्त है.
अब ध्यान देना चाहिए की चोर और छिनाल शब्द एक साथ प्रयुक्त होते हैं बिलकुल चोली-दामन की तरह . ये ब्राह्मणवादी नजरिये से शूद्र शब्द हैं. इनका प्रयोग दमित,दलित या निचले वर्गों के लिए किया जाता रहा है. कृष्ण को छोड़कर किसी भी उदात्त चरित्र के वर्णन के लिए चोर-छिनाल शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ है और कृष्ण के साथ ये शब्द निर्भीक हैं.
 इन शब्दों का अर्थ क्या है -- चोरी का मतलब है कोई वस्तु जो आपके पास नहीं है और आप दूसरे की इज़ाज़त के बिना उसे हस्तगत कर लेते है. छिनाल का अर्थ है अपनी कामुकता को स्वीकार करने वाली स्त्री . यह शब्द ऐसे पुरुषों के लिए भी प्रयुक्त होता है और कृष्ण के लिए प्रयुक्त हुआ .
अब देखा जाये तो मानव-शरीर में दो  अंग सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं - दिमाग और लिंग.दोनों नंबर एक है. पेट और गुर्दा और दिल आदि दो नंबर पर हैं. हाथ पाँव आदि तीसरे नंबर पर आते हैं.
किसी भी उदात्त चरित्र के वर्णन में कुछ निश्चित शब्दों का प्रयोग होता है -- वे धैर्यवान, वीर्यवान और शौर्यवान थे. धैर्य का सम्बन्ध दिमाग से , शौर्य का सम्बन्ध बहुबल से और वीर्य का सम्बन्ध लिंग से है. मुझे ये धैर्यवान और शौर्यवान समझ में आता है लेकिन  वीर्यवान नहीं समझ में आता . क्या किसी के पास सौ दो सौ लीटर वीर्य हो सकता है ? खैर !
 पुरुष की कामुकता को उसके शौर्य का अनिवार्य अंग मन जाता रहा है लेकिन स्त्रियों को उनके अस्तित्व को स्वीकार करने से वंचित किया जाता रहा है. आखिर क्यों? खाने, पीने, सोने और हगने - मूतने की तरह सेक्स भी शरीर का अनिवार्य फंक्शन है और सभी जीव जंतुओं में समान है . भारत को छोड़कर कही भी इतने सारे नैतिक  नियम कानून   सेक्स के आसपास नहीं मिलेंगे.
खासतौर से हिंदी साहित्य तो सामंतशाही और आधुनिकता के पाखंड में लिथड़ा पड़ा है.
 सिगरेट पीती हुई औरत को देखकर हिंदी का लेखक चौक जाता है. मर्दों की पसंदीदा गलियां देती किसी औरत को देखकर हिंदी के लेखक का हार्ट फेल हो सकता है. वह अब भी गहनों से लदी-फदी घूंघट की आड़ में छुई-मुई नार को खोज रहा है जिसे अपनी कामुकता का शिकार बनाने के बाद उसे छिनार कह सके .
छिः.......

vichar

उस शब्द को दुनिया में ले आना सही नहीं जो आपके दिल से होकर नहीं गुजरा हो. लेखक को अपने शब्दों और वचनों के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए. रसूल हमजातोव