मंगलवार, 8 नवंबर 2011

बहुत सुंदर हो तुम


बहुत सुंदर हो तुम,  मेरी कविताओं से कुछ ज्यादा
मुझे मिलना मत कभी, जीने का एक भ्रम टूट जाएगा .
तुम्हारे न बोलने ने मुझे लिखना सिखा दिया
कुछ न कह के भी तुमने दिखना सिखा दिया.

जरा सा भाव जो तुम देते हो
तो मेरा भाव भी चढ़ जाता है.

तुम मेरे पास जब भी आते हो
रगों में रक्त दौड़ जाता है.

टूट कर बरस रहे है बादल
ऐसे में कौन कहाँ जाता है.

तुम कहीं आसमा से आये हो
ये तेरा हौसिला बताता है.

अनुपम

सोमवार, 7 नवंबर 2011

बुद्ध का घर

अगर मै मिट भी गया तो क्या बुरा है 
मेरे जैसों का यही हश्र होता है.
जबतक जिन्दा है सब वाह कहते है
हमारे मरने पर खूब जश्न होता है.
बड़े आदर्श पाले हो महाशय
इन्ही से आपका घर नष्ट होता है.
अंधेरो को हमेशा ही रौशनी की 
लहर से कष्ट होता है.
दिया अपना बुझा लो, अब दिये से
बुद्ध का घर भ्रष्ट होता है.

अनुपम 

जानदार लोगों की जरूरत होती है शानदार काम करने के लिए.


निर्देशक की डायरी १८ 
जानदार लोगों की जरूरत होती है शानदार काम करने के लिए.  

अनुपम 

कोई एक्टर जब फिल्म लोक में पैर रखता है तो उसे प्रोफेसनल बनाया जाता है और जब कोई स्क्रिप्ट यहाँ लेकर पहुंचता है तो उसे कमर्शियल बनाया जाता है. दोनों का एक ही मतलब है - भ्रष्ट करना. आज तो भ्रष्ट होना जैसे नैतिकता हो गई है. ऐसे में मै अकेला आदमी हूँ जो सिनेमा से कला की उम्मीद कर रहा है. फिल्म इंडस्ट्री भ्रष्ट आचार में लालू के बिहार की स्थिति में है. ऐसे में ढेर सारे नितीश कुमारों की आवश्यकता है. सहयोगी साथी मिले तो फिल्मे भी बनेंगी. वैसे तो यहाँ गली गली कास्टिंग काउच और कमर्शियल वाउच फैले हुए हैं.
अनचाहे समझौते आपकी आत्मा को क्षीण कर देते हैं. सपोज - एक लड़की एक्टर है लेकिन काम पाने के लिए जिस तिस के साथ सो जाये, तो आधी तो वही ख़त्म हो जायेगी.  स्क्रिप्ट के साथ भी ऐसा ही होता है. उसके साथ प्रोड्यूसर सोता है. पैसा उसकी ताक़त है. 
साहेबान, पैसे के जोर से बनने वाले सिनेमा से अलग हटना होगा एक दर्शक के रूप में भी और एक निर्माता के रूप में भी. 
सिर्फ रोजी रोटी से संतुष्ट हो जाने वाले लोगों से यह काम नहीं होगा. जानदार लोगों की जरूरत होती है शानदार काम करने के लिए.  

रविवार, 6 नवंबर 2011

वन्दौ प्रथम दुष्ट के चरना... सबसे पहले दुष्टों के चरणों में प्रणाम है.


निर्देशक की डायरी १७
वन्दौ प्रथम दुष्ट के चरना... सबसे पहले दुष्टों के चरणों में प्रणाम है.  
अनुपम 

चालाकी से धन कमाया जा सकता है ज्ञान नहीं. मूर्ख इसलिए मूर्ख रह जाते हैं क्योंकि  वे स्वीकार नहीं करते कि वे मूर्ख हैं. वे अपनी समझ पर नहीं सवाल उठाते, बल्कि अपनी नासमझी के लिए दूसरे को जिम्मेवार ठहराते हैं. जैसे अगर किसी की कविता, विचार या स्क्रिप्ट उनकी समझ में नहीं आये तो उनके हिसाब से ये उनकी समझ कि कमी का नतीजा नहीं है,  अगर ऐसा ही है तो तोता मैना की कहानियां ही श्रेष्ठ साहित्य है जो सबको समझ में आती हैं. मूर्खों में गजब का आत्मविश्वास होता है. अपनी समझ की कमी पर वे वैसे दाँत दिखा कर हे हे हे करते हैं जैसे इसके लिए दूसरा जिम्मेवार हो.
जीवन भर मूर्खों से मेरा पाला पड़ता रहा और अब भी इनकी आदत नहीं हुई. जब मैंने फिल्म पर पी एच डी ज्वाइन की तो पूरे  हिंदी विभाग ने ठहाका लगाया था. ५ साल बाद जब मेरी थेसिस छप के आई तो उसी विभाग ने दामाद की तरह स्वागत किया.
कल ही एक महा मूर्ख से टकराया. गिड़गिड़ा कर कई महीने तक उसने स्क्रिप्ट माँगा, अपनी गरीबी दिखाता रहा कि मेरे पास इतने ही पैसे हैं और ज्यों ही उसके हाथ में स्क्रिप्ट दे दी, उसकी बुद्धि खुल गई, अब उसे हर बात समझना है लेकिन विद्यार्थी कि तरह नहीं चालाक कि तरह. अब उसे किसी और को डाइरेक्टर लेना है या शायद खुद ही डाइरेक्ट करना चाहता है. लेकिन चालीस साल में अर्जित ज्ञान चालीस मिनट में घोल कर भी नहीं पिलाया जा सकता. बड़ा कोई डाइरेक्टर उसके साथ आएगा नहीं क्योंकि यहाँ सब सबको जानते रहते हैं. हालाँकि मै मूर्खों का एहसानमंद भी हूँ क्योंकि कई बार ये कुछ कर गुजरने के लिए मुझे प्रेरित करते है. तो इतनी ही इनकी सार्थकता है किसी क्रिएटिव माइंड के लिए. बंगला  के महान साहित्यकार विमल मित्र ने कहा था  कि दासुओं ( दुष्टों)  ने मुझे साहित्यकार बनाया. यानि लिखते रहने के लिए प्रेरित किया. तुलसी दास भी सबसे पहले इन्ही कि वंदना करते हैं -- वन्दौ प्रथम दुष्ट के चरना... सबसे पहले दुष्टों के चरणों में प्रणाम है.  
किसी भी आर्ट फिल्ड में लेट एज में पैसों के बल पर घुसने वाले लोग सबसे ज्यादा फजीहत कि स्थिति पैदा करते हैं. फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे लोगों को वन टाइम प्रोड्यूसर कहा जाता है जो फिल्म प्रोड्यूस करने के बहाने फिल्म सीखना चाहते हैं और सिखाने वाले भी मिल ही जाते हैं. ये नॉन कामर्सियल गैर फिल्मी लोग प्रतिभा शाली लोगों के रास्ते में सबसे पहले आते हैं. ज्यादातर इनमे से दलाल होते हैं और एक फिल्म प्रोड्यूस करके अपनी छवि साफ़ करना चाहते हैं. हालाँकि अधिकतर असफल ही होते हैं लेकिन बाज नहीं आते. हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे...
मेरा भी सबसे ज्यादा समय ऐसे ही महात्माओं ने ख़राब किया लेकिन अब हमेशा के लिए मैंने इनके लिए दिल दिमाग के दरवाजे बंद कर दिए. किसी भी नए डाइरेक्टर को अपनी पहली फिल्म खुद प्रोड्यूस करना चाहिए या बड़े प्रोडक्शन हाउसेस में अपना प्रोजेक्ट प्रेजेंट करना चाहिए. किसी भी लोभ लालच में फिल्म इंडस्ट्री के हाशिये पर घूमते इन दलालों के चक्कर में नहीं आना चाहिए. मेरा तो बहुत वक़्त ख़राब हुआ लेकिन मेरे अनुभव पढ़कर किसी और का वक़्त बच जाए तो यह आलेख सार्थक होगा.

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

अच्छा सिनेमा!अच्छा सिनेमा!


निर्देशक की डायरी १७ 
अच्छा सिनेमा!अच्छा सिनेमा!
अनुपम
अच्छा सिनेमा! इसलिए क्योंकि मै जानता हूँ कि सिनेमा धर्म और राजनीति से ज्यादा तेजी से समाज को मोटिवेट कर सकता है. गढ़ों और मठों की संगठित शक्ति को परास्त करने का, ढहा देने का शक्तिशाली माध्यम बन सकता है सिनेमा. इसलिए ऐसे बुद्धिजीवी जो राजनीती और धर्म से परहेज करते हों वे सिनेमा को अपनी ताकत बना सकते हैं. सिनेमा से समाज को सुंदर बना सकते हैं.
कवि और नाटक कार हमारे यहाँ एक ही व्यक्ति हुआ करता रहा है. सिनेमा को नाटक की सहजता से बनाने का समय आ गया है. ५ डी कैमरा का उपयोग करके बहुत सस्ते में फिल्म बनाई जा सकती है. लागत इतना कम आएगा की आप दो चार थियेटर में दिखा कर भी अपना पैसा निकाल सकते है और क्षेत्रीय सिनेमा का स्तर  उठा सकते हैं. मै जानता हूँ की छोटे शहरों में बड़े सिनेमा के सपने देखनेवाले क्रिएटिव लोग हैं.
उपलब्ध लोकेशन के हिसाब से सिनेमा लिखिए, वही से कलाकार लीजिये, रिहर्सल करिए, और फिल्म बनाइये.  कवियों, कहानीकारों, नाट्यकर्मियों, चित्रकारों में फिल्म परिकल्पना की सहज प्रतिभा होती है. दो चार शॉर्ट फ़िल्में बनाकर हाथ साफ़ करना चहिये.  महज डेढ़ लाख में ५ डी कैमरा आ जायेगा. कहानी तो वही कहनी है बस दृश्य और ध्वनि की भाषा में कहना है. निर्देशक का काम अपने मातहत टेक्नीशियनों को अपनी फिल्म समझा देना ही है.
तो बनाइये अपने शहर में एक अच्छा सिनेमा.

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

निर्देशक की डायरी १६


निर्देशक की डायरी १६  

सुविचारित आर्ट सबको अच्छा लगता है
अनुपम 

जब से फिल्म इंडस्ट्री में आया हूँ, घुमा फिरा के मुझे एक ही सलाह मिलती है - किसी स्टार को कास्ट कर लीजिये, फिल्म बिक जाएगी, फिनांस आ जायेगा, मै ही प्रोड्यूस कर दूंगा.
अजी साहेबान! मै यहाँ लिख कर स्पष्ट बता रहा हूँ - मुझे नहीं चाहिए सितारों की बैशाखी. मै डाइरेक्टर्स सिनेमा का हिमायती हूँ. मेरी फिल्म मेरे नाम और काम के  बल पर बिकेगी और दिखेगी.मेरा इतिहास उठा कर देख लीजिये. मै 'जिसकी पूंछ उठाओ वही मादा निकलता है' ( धूमिल ) और अपने आप को प्रोड्यूसर कहता है, डाइरेक्टर कहता है. अगर आप  एक इनबोर्न लीडर नहीं हैं तो आप डाइरेक्टर नहीं हैं. अगर आपके पास एक कवि का ह्रदय और एक कहानीकार का मस्तिष्क नहीं हैं तो आप चाहे जो हों, डाइरेक्टर नहीं हैं. 
अगर आप डाइरेक्टर हैं तो अपने बल पर फिल्म बना कर, चला कर दिखाइये. छोडिये सितारों की बैशाखी. इनका आजकल; कोई ईमान धरम नहीं है. आपमें दम है तो  हर प्रोजेक्ट से सितारे पैदा करिए. 
अब समय आ गया है की गड़े मुर्दे उखाड़े जाने चाहिए. डाइरेक्टर शब्द को गरिमा दिलाने वाले पचास के दशक से शुरू होकर ८५ में लुप्त हो गए 'न्यू वेला सिनेमा' को फिर से जगाना चाहिए.  इस महा बोरिंग हिंदी सिनेमा में एक अर्थपूर्ण, कलापूर्ण, बेहतरीन सिनेमा की कमजोर सी धारा हमेशा से बहती रही है. उसे मुख्यधारा बनाने का समय आ गया है. 
देखिये साहब, सिनेमा सिर्फ सौ साल का हुआ और आपका देश पचास एक साल का. अब शिक्षित लोगों की संख्या ज्यादा है.
 'न्यू वेला सिनेमा' के लिए फ़्रांस, इटली, जर्मनी और रूस समेत समूचे यूरोप और जापान और अमेरिका के लिए ५० का दशक सही था. नवीनता के लिए वह समाज तैयार था. हीरोगीरी से ऊब गया था. उसे नया चाहिए था हर जगह. 
अब हमें नया चाहिए. इस नए समय को साहस के साथ अपनी मुट्ठी में कस सकने वाले ओक्टोपसों  की जरूरत है. एक निर्देशक समय को अपनी मुट्ठी में कैद कर लेता है और धीरे धीरे उसे मुक्त करता है ताकि उसका अर्थ सामान्य जन के मन की गति से मिल जाये.फिल्मकार ऑक्टोपस होता है न क़ि शिकार हो जाने वाली मछली? वह मगरमच्छ तो बिलकुल ही नहीं होता. उसे अगर टाइम एंड स्पेस पर अपनी पकड़ साबित करने के लिए स्टार का सहारा लेना पड़े तो वह नकलची है. 
ऐसे मच्छ वितरकों पर सारा दोष मढ़ हैं क्योंकि वितरक सबसे अंतिम कड़ी है और आमतौर से वह जवाब देने के लिए सामने नहीं होता. कोई सच्चे शेर के आड़े नहीं आता सिर्फ इन भेड़ बकरियों के.
 एक दमदार निर्देशक को एक कवि, वैज्ञानिक या समाजसेवी के दंभ और कर्तब्यों का निर्वाह करना चाहिए. उसे अपने खयाल का सम्मान करना चाहिए. सुविचारित आर्ट सबको अच्छा लगता है. और अच्छे क़ि समझ वितरकों, फिनान्सरों, प्रोड्यूसरों, सितारों सब को होती है . 

 

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

निर्देशक कि डायरी १५


क्योंकि कवितायें अपनी जमीन नहीं छोड़तीं. 
अनुपम 
कविता मेरा करियर नहीं है, कविता मेरा स्वभाव है, मेरा श्रम है, मेरे दुःख और आंसू , खुशियाँ और आनंद ये सब मेरी कवितायेँ हैं. और मेरी कविताओं की जन्मभूमि मेरा दिल- दिमाग है.
 बम्बई में भी मैंने खूब कवितायेँ लिखी हैं. मुझे मेरी जानी पहचानी जमीन की गंध जब भी जहाँ भी मिली हैं, मैंने कवितायेँ लिखी हैं. लेकिन वास्तव में मेरी सारी कवितायेँ तो मेरे गाँव की छत से ही उड़ान भरती हैं. कवितायेँ इतनी हैं की दो तीन चार संग्रह आ सकते हैं. रोज सोचता हूँ की कम से कम एक संग्रह प्रकाशन के लिए भेज दूँ. एक सेकेण्ड थॉट हाथ रोक देता है - अगर मै बनारस में इन्हें  अंतिम रूप दूँ तो ये और निखर जाएँगी. 
मै नॉस्टेलजिक जैसे मनोवैज्ञानिक शब्द से एक नजरिये के तौर पर सहमत हूँ लेकिन फ्रायड से ज्यादा मुझे अपने अनुकूल आचार्य रामचंद्र शुक्ल लगते हैं और हैं भी. फ्रायड से ज्यादा ठोस और जमीनी मनोवैज्ञानिक आधार चिंतामणि भाग 1 ,२ में परिलक्षित होता है. शुक्ल जी कहते हैं कि जो बीत गया उसे भूल जाओ एक कठोर और निरर्थक बात है. अतीत और स्मृतियों  का वैभव ही हमारी पूंजी है. हमारा रचनात्मक मन उसी से पुनर्सृजन करता है.
मै उस शिक्षा को लानत भेजता हूँ जो आपको आपकी जमीन से उखाड़ दे.
एक लेखक को तो सबसे पहले क्षेत्रीय होना चाहिए.
मै अपने प्राणों में अपने  परिचित परिवेश की गंध से ही जीवित हूँ. मुझे अपने उन बंधुओं पर आश्चर्य होता है जो जड़ समेत उखड़कर कहीं और बस जाते हैं. इसमें कोई बुराई नहीं हैं, सिर्फ कविताओं का साथ नहीं रह जाता. क्योंकि कवितायें अपनी जमीन नहीं छोड़तीं.