गुरुवार, 19 अगस्त 2010

vichar

ज्ञान विज्ञान को संस्कृत से जन भाषा में ले  आने  वाले कुछ मध्यकालीन कवियों के ख़याल ---

देसिल बयना  सब जन मिठ्ठा
ते तैसिय जम्पओं  अवहट्टा .( संभवतः - विद्यापति )

भाखा बहता नीर है संस्कृत कूप समान !  (कबीर)

पाओस आल ..

पाओस आल ....

जाल खोलते हैं मछुआरे
 पाल खोलते हैं मछुआरे
पहली मछली की तड़पन से साल खोलते है मछुआरे !

बीज ढो रहे हैं बनिहारे
बीज बो रहे है बनिहारे
इस मौसम में किस मौसम के बीज हो रहे हैं बनिहारे ?

घास गढ़ रहे हैं घसियारे
घास पढ़ रहे हैं घसियारे 
बरसा से सरसी धरती कि साँस पढ़ रहे है घसियारे .....

पाल खोलते हैं मछुआरे

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

डर के आदिम वायरस

डर के आदिम वायरस

डर लगता है कि गुरुवार को दाढ़ी बनाऊंगा तो
गुरुग्रह नाराज हो जायेंगे
सोमवार को पिताजी बुरा मानेंगे :
मंगलवार को हनुमान जी
शनिवार को शनि देव !

सोचता हु दाढ़ी छोड़ दूँ इन देवताओं कि ख़ुशी के लिए;
हाँलाकि मुझे नहीं लगता कि आसमान के पीछे बैठकर
वे लोग यही सब देख रहे हैं ! ?


हमारे सामूहिक मन में डर के आदिम वायरस हैं,
जो हमारे बच्चों तक आसानी से चले जाते हैं .

सोमवार, 16 अगस्त 2010

झोपड़पट्टियाँ...एक पटकविता

 

   एक्ट वन , एक्सटेरियर, मॉर्निंग, झोपड़पट्टियाँ.....

सुबह -सुबह शराब पीकर एक औरत दुनिया की बादशाहत  कर रही है
 सूरज की आंच में ये बस्ती चिता की तरह दहक रही है
इस आग में आग है , पानी है, मछलियाँ हैं
 मुर्ग- मुस्सलम है
 मटन है, कबाब है, शबाब है
 नमस्ते है, प्रणाम है, वणक्कम है, आदाब है
 यहाँ भी जिंदाबाद है
 जिन्दगी आबाद है
जिन्दगी की सभी आजादियाँ यहाँ सस्ते में मिलती हैं.

 आसपास की अट्टालिकाएँ सुबह की धूप में बच्चों की तरह खेल रही हैं
 और यहाँ जिन्दगी सबसे बड़ा हादसा झेल रही है --
फिर से सुबह हो गई है और एक और दिन सूरज के नीचे बिताना है ......

एक्ट टू, एक्सटेरियर,मिड डे, झोपड़पट्टियाँ...

तपते फुटपाथ पर जो लेटे है ; वे  भी भारत के बेटे हैं
 माँ बैठी है बगल में पानी लेकर
गोदने की बिंदिया बता रही है की वह किसी आदिवासी गाँव से उखाड़कर आ गिरी है इस झोपड़पट्टी में ...
यहाँ भी उसे अभी तिरपाल भर जगह नहीं मिली है
आठ नौ महीने का स्वस्थ गदराया आदिवासी बच्चा बेसुध सोया है
नाले के ऊपर के फुटपाथ  पर माँ के पास
 ईंटों के चूल्हे पर खाना भी बन रहा है
 एक बालक बची आंच पर मूंगफलियाँ भून  रहा है

 औरतें नहा रही हैं सूरज के तेजाबी किरणों के शॉवर में
 कुर्ती- पेटीकोट के बाहर समूचा जिस्म सांवला हो गया है ...
ऐसा लग रहा है कि पैदाइश से ही ये एक लम्बी चिता में जलाये जा रहे हैं
 एक जवान होती हुई लड़की आईने में अपना रूप संवार रही है
 आईना जैसे सूरज हो गया है
 अपने सहने की ताक़त से ,जलने की जुर्रत से उस लड़की की चमड़ी आईने को मरहम दे रही है
 जिसे सूरज अपनी चौंध से फोड़ डालना चाहता है
 अगल -बगल उसके दो किशोर साथी बैठे हैं
 लड़की ने पसीने और धूल से झोल बने बालों को पुरानी रूमाल से कस लिया है
 ये लो वह तैयार हो गई और तीनों  फुटपाथ पर बैठी माँ से उसका हाल  पूछने आये हैं

 मैं भी वहीँ खड़ा हूँ
 यह देश आजाद नहीं हुआ है इस बात पर अड़ा हूँ .......


एक्ट थ्री , एक्सटेरियर, इविनिंग, झोपड़पट्टियाँ.....

आपने कभी यहाँ शाम को उतरते देखा है ?
जब दिन भर की धूप और धूल धोकर बालों में फूल सजाये जाते हैं
 तवे पर तवे भर की रोटियाँ बनती हैं
बोटियाँ छनती हैं
बोतलें खुलतीं हैं
 बच्चे खेलते हैं
 गजरे वाले बालों के चेहरे की चमड़ी में दमड़ी भर का पाउडर मला जाता है
कालिख को सफेदी से छला जाता है

एक दूसरा बाजार सजता है
 हर तार बजता है
मैं उस बाजार में एक आवारा दर्शक की तरह घुसता हूँ 
अनजान पते पूछता हूँ ...
नशे में धुत्त एक बूढ़े को नौजवानों ने धुन दिया है
आतंक ने यहाँ भी अपना जाला बुन दिया है
 पिंजरे में गाती रंगीन चिड़िया और चौखट पर बैठी बुढ़िया को कोई डर नहीं है...
ईश्वर आसमान में क्यों टंगा है ?
 उस बेचारे के पास भी तो घर नहीं है !

ऐसा घर जहाँ वह खुश रह सके

जहाँ कोई किसी को नुकसान न पहुंचाए
 जिन्दगी की धज्जियाँ न उड़ाये........

vichar

जीवन ऐसे जियो जैसे अभिनय , अभिनय ऐसे करो जैसे जीवन .जे. कृष्णमूर्ती

रविवार, 15 अगस्त 2010

जश्ने -आजादी के बाद .... पार्क के अंधियारे में जहाँ दिन के उजाले में जश्ने - आजादी का उत्सव मनाया गया था वहां रात के अंधियारे में एक बूढा आदमी चवों के बल बैठा कुछ चुन रहा था कीचड़ में कागज के तिरंगे झंडे बिखरे थे ; बच्चे जिन्हें खेलकर ऊब गए थे और बड़ों के लिए जो फगुआ का मेला हो गया था

जश्ने -आजादी के बाद ....

पार्क के अंधियारे में जहाँ दिन के उजाले में
जश्ने - आजादी का उत्सव मनाया गया था
वहां रात के अंधियारे में
एक बूढा आदमी चवों के बल बैठा कुछ चुन रहा था
कीचड़ में कागज के तिरंगे झंडे बिखरे थे ; बच्चे जिन्हें खेलकर
 ऊब गए थे और बड़ों के लिए
जो फगुआ का मेला हो गया था .
मेरी अँगुलियों में फंसे सिगरेट के धुएं को ताड़कर बूढ़े ने अपनी नाक , चश्मा
और आँखे मेरी तरफ भेदी ....
अरे ! यह तो गाँधी है !
मैं विदेशी सिगरेट बुझाने की जगह खोजने लगा ....
'लाओ मुझे दे दो!' गाँधी ने कहा . 'तुम ये भीगे हुये झंडे सम्हालो !'

पूरे शहर में डस्टबिन खोजने के बाद हम स्टेशन पहुचे .
स्टेशन पर हर डस्टबिन पान की पीक से रंग हुआ था .
'नौजवान तुम पानी लेकर आओ !' गाँधी ने कहा और तत्परता से सफाई में जुट गए .
अनाउंसर मुक्तिबोध की कविता सुना रहा था  --
"जो है उससे बेहतर चाहिए
सारी दुनिया साफ करने के लिए मेहतर चाहिए .....
गाँधी भी साथ गुनगुना रहे थे.
मैं गीले झंडे और सिगरेट का टुकड़ा लिए खड़ा था - तो इन का क्या करूँ ?
रद्दी कागज के टुकड़ों से थूक पोंछकर साफ करते बूढ़े ने बिना विश्राम या  विराम लिए कहा -
'तुम झंडे सम्हालो ! मैं सफाई कर लूँगा, और सुनो !
 इनसे लगी हुई मिट्टी भी सम्हाल कर रखना !
उसके हर कण में शहादतों की दास्तानें हैं !

मुझे याद नहीं की घर लाकर उन्हें कहाँ रख दिया ....

शनिवार, 14 अगस्त 2010

आजादी

आजादी
क्या उन तीन थके रंगों का नाम है
जिसे एक पहिया ढोता है
या इसका कुछ और मतलब होता है !
सुदामा पाण्डेय धूमिल (संभवतः १९६० की रचना  )